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फ़िक़्ह तथा उसूल-ए-फ़िक़्ह

अबू क़तादा रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं कि वह अपने एक क़र्ज़दार की तलाश में थे। और वह छुपते फिर रहा था। एक बार मिल गया, तो बोला कि मैं अभाव का शिकार हूँ। उन्होंने अल्लाह की क़सम खाने को कहा, तो उसने अल्लाह की क़सम खा ली। तब अबू क़तादा रज़ियल्लाहु अनहु ने कहा : मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है :

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«अबू क़तादा रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं कि वह अपने एक क़र्ज़दार की तलाश में थे। और वह छुपते फिर रहा था। एक बार मिल गया, तो बोला कि मैं अभाव का शिकार हूँ। उन्होंने अल्लाह की क़सम खाने को कहा, तो उसने अल्लाह की क़सम खा ली। तब अबू क़तादा रज़ियल्लाहु अनहु ने कहा : मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है : "जिसे यह पसंद हो कि अल्लाह उसे क़यामत के दिन की परेशानियों से मुक्त कर दे, उसे चाहिए कि किसी अभावग्रस्त व्यक्ति को मोहलत दे या उसका क़र्ज़ माफ़ कर दे।"»

Meaning translation ·

Explanation

The meaning in a few plain lines

अबू क़तादा अंसारी रज़ियल्लाहु अनहु एक व्यक्ति की तलाश में थे, जिसने उनसे क़र्ज़ लिया था और उनसे छुपता फिरता था। अंततः उन्होंने उसे ढूँढ ही लिया। लेकिन उसने कहा : मैं इस समय कठिन परिस्थितियों से गुज़र रहा हूँ और आपका क़र्ज़ चुकाने के लिए मेरे पास कोई साधन नहीं है। चुनांचे अबू क़तादा रज़ियल्लाहु अनहु ने उसे अल्लाह की क़सम खाने को कहा कि क्या सच-मुच उसके पास क़र्ज़ चुकाने का कोई साधन नहीं है? उसने अल्लाह की क़सम खाकर बताया कि वह सच बोल रहा है। इसपर अबू क़तादा रज़ियल्लाहु अनहु ने बताया कि उन्होंने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है : जिसे यह बात प्रसन्न करती हो कि अल्लाह उसे क़यामत के दिन की परेशानियों, कठिनाइयों और भयावहताओं से मुक्ति प्रदान करे, उसे चाहिए कि कठिनाई में पड़े हुए व्यक्ति के साथ उदारता बरते। यानी क़र्ज़ अदा करने के लिए कुछ समय दे, अदायगी का मुतालबा कुछ समय के लिए रोक दे अथवा क़र्ज़ का कुछ भाग या पूरा क़र्ज़ ही माफ़ कर दे।

Source
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
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