HI
All hadiths
The complete card collection, filter by chapter
पवित्र क़ुरआन तथा उससे संबंधित अन्य विषय
26
हदीस तथा उससे संबंधित अन्य विषय
3
अक़ीदा
135
फ़िक़्ह तथा उसूल-ए-फ़िक़्ह
288
फ़ज़ीलतें तथा आदाब
288
आह्वान एवं भलाई का आदेश देने तथा बुराई से रोकने का प्रबंध करना
15
सीरत एवं इतिहास
38
655 hadiths
इब्ने उमर (रज़ियल्लाहु अनहुमा) से मरफ़ूअन रिवायत है: सोते समय अपने घरों में आग जला कर न छोड़ो।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की पत्नी, मुसलमानों की माता उम्म-ए-सलमा -रज़ियल्लाहु अनहा- से रिवायत है, वह कहती हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जिस व्यक्ति के पास क़ुरबानी का जानवर हो, जिसे वह ज़बह करने का इरादा रखता हो, तो जुल-हिज्जा का चाँद निकल आने के बाद वह क़ुरबानी से पहले अपने बालों और नाख़ुनों में से कुछ न काटे।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) कहती हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब तेज़ हवाएँ चलतीं तो यह दुआ पढ़ा करते थे: «اللَّهُمَّ إنِّي أسْأَلُك خَيرها وخير ما فيها وخَير ما أُرسِلت به، وأعوذ بك من شرِّها وشرِّ ما فيها وشرِّ ما أُرسِلت به» अर्थात, “ऐ अल्लाह ! मैं तुझसे इसकी भलाई तथा जो भलाई इसमें रखी गई है और जिस भलाई के साथ यह भेजी गई है, का सवाल करता हूँ और तेरी शरण माँगता हूँ, इसकी बुराई से तथा उस बुराई से जो इसमें में रखी गई है और उस बुराई से जिस के साथ यह भेजी गई है।”
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू क़तादा (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि उन्होंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को फ़रमाते हुए सुना: ख़रीद- बिक्री में अधिक क़सम खाने से बचो, क्योंकि कसम सामान बेचवाकर मुनाफ़ा सामयिक रूप से बढ़ा तो देती है मगर फिर घटा भी देती है।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
बुरैदा रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जिसने अमानत की क़सम खाई, वह हममें से नहीं है।"
इस ह़दीस़ को अबू दावूद और अह़मद ने रिवायत किया है
अबू सईद खु़दरी रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ईद अल-अज़हा या ईद अल-फ़ित्र के दिन ईदगाह की ओर निकले और इस दौरान औरतों के निकट से गुज़रे, तो फ़रमाया : "ऐ औरतो! तुम सदक़ा किया करो, क्योंकि मैंने जहन्नम के अंदर तुम्हारी संख्या अधिक देखी है।" औरतों ने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! ऐसा क्यों है? आपने उत्तर दिया : "तुम लानत अधिक करती हो और पति की नाशुक्री करती हो। मैंने विवेक एवं दीन में अधूरी होने के बावजूद तुम (औरतों) से ज़्यादा किसी को भी एक विवेकशील व्यक्ति के विवेक को भ्रमित कर देने वाला नहीं देखा।" औरतों ने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! हमारे दीन और हमारे विवेक की कमी क्या है? आपने उत्तर दिया : "क्या औरत की गवाही मर्द की आधी गवाही के बराबर नहीं है?" उन्होंने कहा : जी है। आपने कहा : "यही उसके विवेक की कमी को दर्शाता है। क्या ऐसा नहीं है कि जब औरत माहवारी की अवस्था में होती है, तो न नमाज़ पढ़ सकती है, न रोज़ा रख सकती है?" औरतों ने कहा : जी, ऐसा तो है। आपने फ़रमाया : "यही उसके दीन की कमी को दर्शाता है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
उम्म-ए-अतिय्या रज़ियल्लाहु अनहा, जिन्होंने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हाथ पर बैअत की थी, से रिवायत है, वह कहती हैं : "हम (मासिक धर्म से) पाक होने के बाद मटमैले और पीले रंग के पानी को कुछ शुमार नहीं करती थीं।"
इस ह़दीस़ को अबू दावूद ने इन शब्दों के साथ रिवायत किया है। जबकि बुख़ारी ने (بعد الطهر, अर्थात; पवित्र हो जाने के बाद) की वृद्धि के बिना रिवायत किया है
हुज़ैफ़ा (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः हमें लोगों पर तीन बातों में फ़ज़ीलत दी गई है। हमारी सफ़ों को फ़रिश्तों की सफ़ों की तरह बनाया गया है, हमारे लिए पूरी ज़मीन को मस्जिद बनाया है तथा जब पानी न मिले तो उसकी मिट्टी को हमारे लिए पवित्रता प्राप्त करने का साधन बनाया गया है तथा आपने एक और बात बताई।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
समुरा बिन जुनदुब (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: जिसने जुमे के दिन वज़ू किया, उसने सुन्नत पर अमल किया और बहुत अच्छा किया तथा जिसने स्नान किया, उसका यह कार्य उससे बेहतर है।
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है। - इसे दारिमी ने रिवायत किया है।
अम्र बिन सुलैम अंसारी कहते हैं : मैं गवाही देता हूँ कि अबू सईद ने कहा है और उन्होंने गवाही दी है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जुमे के दिन हर व्यस्क व्यक्ति पर स्नान करना अनिवार्य है तथा यह कि वह दातुन करे और मिल सके तो ख़ुशबू भी लगाए।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
عن أبي هريرة رضي الله عنه مرفوعاً: «إذا أَحَبَّ اللهُ تعالى العَبْدَ، نَادَى جِبْرِيلَ: إنَّ اللهَ تعالى يُحِبُّ فلاناً، فَأَحْبِبْهُ، فَيُحِبُّهُ جِبْرِيلُ، فَيُنَادِي في أَهْلِ السَّمَاءِ: إنَّ اللهَ يحِبُّ فلاناً، فَأَحِبُّوهُ، فَيُحِبُّهُ أَهْلُ السَّمَاءِ، ثُمَّ يُوضَعُ لَهُ القَبُولُ في الأرضِ». وفي رواية: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : «إنَّ اللهَ تعالى إذا أَحَبَّ عَبْدًا دَعَا جِبْرِيلَ، فقال: إني أُحِبُّ فلاناً فَأَحْبِبْهُ، فَيُحِبُّهُ جِبْرِيلُ، ثم ينادي في السَّمَاءِ، فيقول: إنَّ اللهَ يُحِبُّ فلاناً فَأَحِبُّوهُ، فَيُحِبُّهُ أَهْلُ السَّمَاءِ، ثُمَّ يُوضَعُ له القَبُولُ في الأرضِ، وإذا أَبْغَضَ عَبْدًا دَعَا جِبْرِيلَ، فيقول: إني أُبْغِضُ فلاناً فَأَبْغِضْهُ. فَيُبْغِضُهُ جِبْرِيلُ، ثُمَّ ينادي في أَهْلِ السَّمَاءِ: إنَّ اللهَ يُبْغِضُ فلاناً فَأَبْغِضُوهُ، ثُمَّ تُوضَعُ له البَغْضَاءُ في الأرضِ».
متفق عليه. الرواية الأولى لفظ البخاري، والثانية لفظ مسلم
अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने, जबकि मुआज़ रज़ियल्लाहु अनहु सवारी पर आपके पीछे बैठे थे, फ़रमाया : "ऐ मुआज़ बिन जबल!" उन्होंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! मैंं उपस्थित हूँ। आपने फिर कहा : "ऐ मुआज़ बिन जबल!" उन्होंने दोबारा कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, मैं उपस्थि हूँ! आपने फिर कहा : "ऐ मुआज़ बिन जबल!" तो उन्होंने तीसरी बार कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, मैं उपस्थित हूँ! तीसरी बार के बाद आपने फ़रमाया : "जिस बंदे ने सच्चे दिल से यह गवाही दी कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के बंदे तथा उसके रसूल हैं, अल्लाह उसे जहन्नम पर हराम कर देगा।" उन्होंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! क्या मैं लोगों को आपकी यह बात बता न दूँ कि वे ख़ुश हो जाएँ? आपने फ़रमाया : "तब तो वे इसी पर भरोसा कर बैठेंगे।" चुनांचे मृत्यु के समय मुआज़ रज़ियल्लाहु अनहु ने गुनाह के भय से यह हदीस लोगों को बता दी।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: एक व्यक्ति किसी रास्ते से गुज़र रहा था कि उसे सख़्त प्यास लगी। इतने में उसे एक कुआँ मिला, तो उसमें उतरकर उसने पानी पिया। ऊपर आया तो देखा कि एक कुत्ता प्यास के कारण हाँप रहा है और कीचड़ चाट रहा है। उसने अपने दिल में कहा: इस कुत्ते को भी उतनी ही प्यास लगी होगी, जितनी मुझे लगी थी। इसलिए वह कुएँ में उतरा, अपने मोज़े में पानी भरा और उसे अपने मुँह से पकड़कर ऊपर आया तथा कुत्ते को पानी पिलाया। अल्लाह को उसका यह नेक काम इतना पसंद आया कि उसे क्षमा कर दिया। सहाबा ने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल! क्या हमें जानवरों की सहायता करने में भी नेकी मिलती है? आपने कहा: हर ज़िंदा कलेजे वाले की सहायता में नेकी है। एक रिवायत में हैः अल्लाह ने उसके इस कार्य की क़द्र की और उसे क्षमा कर दिया तथा जन्नत में दाख़िल होने का सौभाग्य प्रदान किया। तथा एक रिवायत में है: एक कुत्ता एक कुएँ के चारों ओर चक्कर लगा रहा था और क़रीब था कि वह प्यास से हलाक हो जाए कि उसे बनी इसराईल की एक वेश्या ने देख लिया। उसने कुत्ते पर दया करते हुए, अपना मोज़ा उतारा और उसके ज़रिए कुत्ते के लिए पानी निकालकर उसे पिलाया, तो इस पुण्य के कारण उसे क्षमा कर दिया गया।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है। - इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "मुसलमान वह है, जिसकी ज़बान और हाथ से मुसलमान सुरक्षित रहें और मुहाजिर वह है, जो अल्लाह की मना की हुई चीज़ें छोड़ दे।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू बकरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से रिवायत है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: ज़माना घूमकर आज फिर उसी हालत पर आ गया है, जो हालत उस दिन थी, जिस दिन अल्लाह ने आसमान व ज़मीन को पैदा किया था। साल के बारह महीने हैं, जिनमें चार महीने हराम (जिनमें युद्ध करना हराम है) हैं: तीन लगातार हैं, यानी ज़ुल- क़ादा, ज़ुल- हिज्जा, मुहर्रम और मुज़र क़बीले का रजब, जो अंतिम जुमादा और शाबान के बीच है। फिर आपने फ़रमाया: यह कौन- सा महीना है? हमने कहा: अल्लाह और उसके रसूल ही बेहतर जानते हैं। यह सुनकर आप कुछ देर ख़ामोश रहे। हमें लगा कि शायद आप उसको कोई नया नाम देंगे। फिर फ़रमाया: क्या यह ज़ुल- हिज्जा नहीं है? हमने कहा: अवश्य! फिर आपने कहा: यह कौन- सा शहर है? हमने कहा: अल्लाह और उलके रसूल बेहतर जानते हैं! यह सुनकर आप ख़ामोश हो गए। हमें लगने लगा कि शायद आप उसे कोई नया नाम देंगे। फिर फ़रमाया: क्या यह मक्का नगर नहीं है? हमने कहा: अवश्य! फिर आपने पूछा: आज कौन- सा दिन है? हमने कहा कि अल्लाह और उसके रसूल ही बेहतर जानते हैं। यह सुनकर आप ख़ामोश रहे, जिससे हमें ख़्याल हुआ कि शायद आप उसे कोई और नाम देंगे। फिर फ़रमाया: क्या यह क़ुर्बानी का दिन नहीं है? हमने कहा: अवश्य! आपने फ़रमाया: तो जान रखो, तुम्हारा ख़ून, तुम्हारा माल और तुम्हारी प्रतिष्ठा तुम्हारे लिए उसी तरह हराम है, जिस तरह तुम्हारा यह दिन, तुम्हारे इस नगर और तुम्हारे इस महीने में हराम है। याद रखो, जल्द ही तुमको अपने रब के सामने उपस्थित होना है और वह तुमसे तुम्हारे कर्मों के बारे में पूछेगा। सुन लो, तुम मेरे बाद दोबारा काफ़िर न हो जाना कि एक- दूसरे की गर्दन उड़ाने लगो। ख़बरदार! हर उपस्थित व्यक्ति पर लाज़िम है कि वह मेरा यह पैग़ाम उन लोगों तक पहुँचाए, जो यहाँ उपस्थित नहीं हैं। इसलिए कि बहुत मुमकिन है कि जिसके पास मेरी बात (अप्रत्यक्ष रूप से) पहुँचे, वह ऐसे कई कुछ लोगों से अधिक याद रखने वाला हो, जिन्होंने उसे (प्रत्यक्ष रूप से मुझसे) सुना है। फिर आपने फ़रमाया: सुनो, क्या मैंने पहुँचा दिया है? सुनो, क्या मैंने पहुँचा दिया है? हमने कहा: हाँ! आपने फ़रमाया: ऐ अल्लाह! तू गवाह रह!
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: काफ़िर जब कोई अच्छा काम करता है, तो उसके बदले में उसे दुनिया में रोज़ी दे दी जाती है, लेकिन जहाँ तक मोमिन की बात है, तो उसकी नेकियों को अल्लाह उसकी आख़िरत के लिए जमा रखता है और उसके आज्ञापालन का बदला उसे दुनिया में रोज़ी भी प्रदान करता है। एक अन्य रिवायत में है: अल्लाह किसी मोमिन की किसी नेकी की उपेक्षा नहीं करता। उसे दुनिया में भी उसका बदला दिया जाता है और आख़िरत में भी उसका बदला दिया जाएगा। लेकिन जहाँ तक काफ़िर की बात है, तो जो अच्छे काम वह अल्लाह के लिए करता है, उनके बदले में उसे दुनिया में रोज़ी दे दी जाती है, यहाँ तक कि जब वह आख़िरत में पहुँचेगा, तो उसके पास कोई नेकी नहीं होगी कि उसका बदला उसे दिया जाए।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जब रमज़ान का महीना आता है, तो जन्नत के द्वार खोल दिए जाते हैं, जहन्नम के द्वार बंद कर दिए जाते हैं और शैतानों को बेड़ियों में जकड़ दिया जाता है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू ज़र (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: अगर तुम महीने के तीन रोज़े रखो, तो (चाँद की) तेरहवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं तारीख़ों को रखो। क़तादा बिन मिलहान (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हमें 'सफ़ेद दिनों' अर्थात (चाँद की) तेरहवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं तारीख़ों को रोज़ा रखने का आदेश देते थे। अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अनहुमा) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) 'सफ़ेद दिनों' के रोज़े न घर में रहते हुए छोड़ते थे न सफ़र में।
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है ।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: जब नमाज़ के लिए अज़ान कही जाती है, तो शैतान हवा निकालता हुआ पीठ फेरकर भाग खड़ा होता है; ताकि अज़ान की आवाज़ न सुन सके। जब अज़ान पूरी हो जाती है, तो वापस आ जाता है। फिर जब नमाज़ के लिए इक़ामत कही जाती है, तो पीठ फेरकर भाग जाता है। जब इक़ामत ख़त्म हो जाती है, तो फिर सामने आ जाता है, ताकि नमाज़ी के ध्यान को भंग कर सके। वह कहता है: यह बात याद कर, वह बात याद कर। (यानी वह बातें जो पहले नमाज़ी को याद नहीं थीं) यहाँ तक कि आदमी को यह याद नहीं रहता कि उसने कितनी रकात नमाज़ पढ़ी है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अनस (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) साद बिन उबादा (रज़ियल्लाहु अनहु) के यहाँ पहुँचे, तो उन्होंने रोटी और तेल पेश किया। आपने उसे खाया और यह दुआ फ़रमाई : "أفْطَرَ عِنْدَكُمُ الصَّائِمُونَ؛ وَأكَلَ طَعَامَكُمُ الأَبرَارُ، وَصَلَّتْ عَلَيْكُمُ المَلاَئِكَةُ" (तुम्हारे यहाँ रोज़ेदार इफ़तार किया करें, तुम्हारा खाना नेक लोग खाएँ और फ़रिश्ते तुम्हारे लिए दुआ करें)।
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है। - इसे दारिमी ने रिवायत किया है।
मुआज़ा अदविय्या कहती हैं कि मैंने आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) से पूछा: क्या अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हर महीने तीन रोज़े रखा करते थे? उन्होंने उत्तर दिया: हाँ। मैंने पूछा: आप महीने के किस भाग में रोज़ा रखते थे? उन्होंने उत्तर दिया: आपको इसकी परवाह नहीं थी कि महीने के किस भाग में रोज़े रखे जाएँ।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू सईद राफ़े बिन मुअल्ला (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने मुझसे फ़रमाया: क्या मैं तुम्हें, तुम्हारे मस्जिद से निकलने से पहले- पहले क़ुरआन की महानतम सूरा न सिखाऊँ? आपने मेरा हाथ पकड़ लिया। जब हम मस्जिद से निकलने लगे, तो मैंने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल! आपने कहा था कि आप हमें क़ुरआन की महानतम सूरा सिखाएँगे? तो फ़रमाया: यह सूरा है: अल- हमदु लिल्लाहि रब्बिल- आलमीन, यह सब-अल-मसानी (बार- बार दोहराई जाने वाली सात आयतें) और महान क़ुरआन का सार है, जो मुझे दिया गया है।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।
आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- का वर्णन है, वह कहती हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जो कुरान में निपुण है, वह सम्मानित और नेक राजदूतों (फरिश्तों) के साथ होगा, तथा जो अटक-अटक कर क़ुरान पढ़ता है और उसे क़ुरान पढ़ने में कठिनाई होती है, उसके लिए दोहरा सवाब है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
उक़बा बिन आमिर (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: क्या तुम्हें मालूम नहीं कि जो आयतें आज रात उतरी हैं, उन जैसी आयतें कभी नहीं देखी गईं! ये आयतें हैं: क़ुल अऊज़ु बि-रब्बिल फ़लक़ और क़ुल अऊज़ु बि-रब्बिन्नास।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
Previous page
Page 19 of 28
Next page