Hadith for the World
फ़िक़्ह तथा उसूल-ए-फ़िक़्ह

इबादतों पर आधारित फ़िक़्ह

231 hadiths

231 hadiths

आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से रिवायत है, वह कहती हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : “जो अल्लाह से मिलना पसंद करता है, अल्लाह भी उससे मिलना पसंद करता है और जो अल्लाह से मिलना नापसंद करता है, अल्लाह भी उससे मिलना नापसंद करता है।” मैंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! क्या इससे अभिप्राय मौत को नापसंद करना है? वैसे तो हम सब लोग मौत को नापसंद करते हैं! आपने उत्तर दिया : “मतलब यह नहीं है, बल्कि मतलब यह है कि मोमिन को जब अल्लाह की रहमत, उसकी प्रसन्नता और उसकी जन्नत की ख़ुशख़बरी दी जाती है, तो वह अल्लाह से मिलना पसंद करता है और अल्लाह भी उससे मिलना पसंद करता है। लेकिन काफ़िर को जब अल्लाह के अज़ाब और उसके प्रकोप की सूचना दी जाती है, तो वह अल्लाह से मिलना नापसंद करता है और अल्लाह भी उससे मिलना नापसंद करता है।”इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अली बिन अबू तालिब (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब नमाज़ के लिए खड़े होते, तो यह दुआ पढ़तेः «وجَّهت وجْهي للذي فَطَر السَّماوات والأرض حَنيفا، وما أنا من المشركين، إن صلاتي، ونُسُكي، ومَحْيَاي، ومَمَاتِي لله ربِّ العالمين، لا شريك له، وبذلك أُمِرت وأنا من المسلمين، اللهُمَّ أنت الملك لا إله إلا أنت أنت ربِّي، وأنا عَبدُك، ظَلمت نفسي، واعترفت بِذنبي، فاغفر لي ذُنوبي جميعا، إنه لا يَغفر الذُّنوب إلا أنت، واهدِنِي لأحْسَن الأخلاق لا يَهدي لأحْسَنِها إلا أنت، واصرف عَنِّي سيِّئها لا يصرف عني سيِّئها إلا أنت، لبَّيك وسَعديك والخير كلُّه في يَديك، والشَرُّ ليس إليك، أنا بِك وإليك، تَبَاركت وتَعاليت، أستغفرك وأتوب إليك» (मैंने एकाग्र होकर अपना मुख उसकी ओर कर लिया है, जिसने आकाशों और धरती की रचना की है, और मैं साझी ठहराने वालों में से नहीं हूँ। मेरी नमाज़, मेरी क़ुरबानी, मेरा जीना और मेरा मरना, सब अल्लाह के लिए है, जो समस्त संसार का रब है। उसका कोई साझी नहीं। मुझे इसी का आदेश दिया गया है और मैं मुसलमानों में से हूँ। ऐ अल्लाह! तू ही बादशाह है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं। तू मेरा रब है और मैं तेरा बंदा। मैंने अपने ऊपर ज़ुल्म किया है और अपने पापों का इक़रार करता हूँ। अतः, मेरे समस्त पापों को क्षमा कर दे, क्योंकि पापों को क्षमा करने वाला तेरे सिवा कोई नहीं। तू मुझे अच्छे आचरण का मार्ग दिखा, क्योंकि अच्छे आचरण का मार्ग केवल तू ही दिखाता है। और बुरे आचरण से मुझे दूर रख, क्योंकि बुरे आचरण से मुझे दूर केवल तू ही रख सकता है। मैं तेरे आगे उपस्थित हूँ, तेरा आज्ञाकारी हूँ तथा समस्त प्रकार की भलाई तेरे ही हाथों में है, और बुराई की निसबत तेरी ओर नहीं की जा सकती। मेरी तौफीक़ तेरी तरफ़ से है और मेरी इल्तिजा भी तुझसे है। तू बरकत वाला तथा बुलंद है। मैं तुझ ही से क्षमा माँगता हूँ तथा तेरे ही सामने तौबा करता हूँ।) और जब रूकू करते, तो कहतेः «اللهُمَّ لك رَكَعت، وبِك آمَنت، ولك أسْلَمت، خَشع لك سَمعي، وبَصري، ومُخِّي، وعَظمي، وعَصَبي» (ऐ अल्लाह! मैंने तेरे ही लिए रुकू किया, मैं तुझपर ईमान लाया और तेरा आज्ञाकारी बना। तेरे लिए मेरे कान, मेरी आँख, मेरे दिमाग, मेरी हड्डी तथा मेरे पुठ्ठे ने विनम्रता दिखाई।) और जब रुकू से सर उठाते, तो कहतेः «اللهُمَّ ربَّنا لك الحَمد مِلْءَ السماوات، و مِلْءَ الأرض، ومِلْءَ ما بينهما، ومِلْءَ ما شئت من شيء بعد» (ऐ अल्लाह! तेरे लिए आकाश भर, धरती भर, और जो कुछ इन दोनों के बीच है, उतनी और उसके पश्चात जितनी तू चाहे, उतनी प्रशंसा है।) और जब सजदा करते, तो कहतेः «اللهُمَّ لك سَجدت، وبك آمَنت، ولك أسْلَمت، سجد وجْهِي للذي خَلَقه، وصَوَّره، وشَقَّ سَمعه وبَصره، تبارك الله أحْسَن الخَالقِين» (ऐ अल्लाह! मैंने तेरे लिए सजदा किया, मैं तुझपर ईमान लाया और तेरा आज्ञाकारी हुआ। मेरे चेहरे ने उसके लिए सजदा किया, जिसने उसकी रचना की है और उसका चित्रण किया है, तथा कान और आँख को चीरा है। अल्लाह तआला बड़ी बरकत वाला है और सभी बनाने वालों से अच्छा बनाने वाला है।) फिर सबसे अंत में तशह्हुद और सलाम फेरने के बीच यह दुआ पढ़तेः «اللهُم اغْفِر لي ما قَدَّمت وما أخَّرت، وما أسْرَرْت وما أعْلَنت، وما أَسْرَفْتُ، وما أنت أعْلَم به مِنِّي، أنت المُقَدِّم وأنت الْمُؤَخِّر، لا إله إلا أنت» (ऐ अल्लाह! मैंने जो पहले किया और जो बाद में किया, जो छिपाकर किया तथा जो दिखाकर किया और जिसमें मैंने अति की और जिसको तू मुझसे भी बेहतर जानने वाला है, उन सभी गुनाहों को माफ़ कर दे। तू ही आदेशपालन का सामर्थ्य देकर आगे करता है और तू ही अवज्ञा के कारण पीछे करता है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है।)इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) का वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब रात को तहज्जुद पढ़ते, तो यह दुआ पढ़ते : «اللهم ربَّنا لك الحمدُ، أنت قَيِّمُ السموات والأرض، ولك الحمدُ أنت ربُّ السموات والأرض ومَن فيهنَّ، ولك الحمدُ أنت نورُ السموات والأرض ومن فيهنَّ، أنت الحقُّ، وقولُك الحقُّ، ووعدُك الحقُّ، ولقاؤك الحقُّ، والجنةُ حقٌّ، والنارُ حقٌّ، والساعةُ حقٌّ، اللهم لك أسلمتُ، وبك آمنتُ، وعليك توكَّلتُ، وإليك خاصمتُ، وبك حاكمتُ، فاغفر لي ما قدَّمتُ وما أخَّرتُ، وأسررتُ وأعلنتُ، وما أنت أعلم به مني، لا إلهَ إلا أنت». (ऐ अल्लाह! ऐ हमारे रब! सारी प्रशंसा तेरी है, तू आकाशों तथा धरती का रखवाला है। सारी प्रशंसा तेरी है, तू आकाशों तथा धरती और उनकी सारी वस्तुओं का रब है। सारी प्रशंसा तेरी है, तू ही आकाशों तथा धरती और उनकी सारी वस्तुओं का नूर है। तू सत्य है। तेरी बात सत्य है। तेरा वचन सत्य है। तुझसे मिलना सत्य है। जन्नत सत्य है। जहन्नम सत्य है। क़यामत सत्य है। ऐ अल्लाह! मैंने अपने आपको तेरे हवाले कर दिया, तुझपर ईमान लाया, तुझपर भरोसा किया, तेरी मदद से अपने शत्रुओं से झगड़ा किया और निर्णय को तेरे हवाले कर दिया। अतः, मेरे उन सारे गुनाहों को क्षमा कर दे, जो मैंने पहले किए और जो मैं करने वाला हूँ और जो मैंने छिपाकर किए और जो दिखाकर किए और जिन्हें तू मुझसे अधिक जानता है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है।)इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से रिवायत है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : “कोई ऐसा दिन नहीं, जिसमें अल्लाह जहन्नम से उतने बंदों को मुक्त करता हो, जितने बंदों को अरफ़ा के दिन मुक्त करता है। वह निकट आ जाता है और फ़रिश्तों के सामने उनपर गर्व करते हुए कहता है : यह लोग क्या चाहते हैं?”इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जब तुममें से कोई नींद से जागे, तो तीन बार अपनी नाक में पानी डालकर झाड़ ले, क्योंकि शैतान उसकी नाक के अंदर रात गुज़ारता है।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
लक़ीत बिन सबिरा -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- कहते हैं कि मैं बनू मुनतफ़िक़ के प्रतिनिधि के रूप –अथवा बनू मुनतफ़िक़ के प्रतिनिधिंडल में शामिल होकर- अल्लाह रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आया था। उनका बयान है कि जब हम अल्लाह के रसलू -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के यहाँ आए, तो हमने आपको घर में नहीं पाया। हमें मोमिनों की माता आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- मिलीं। वह कहते हैं कि उन्होंने हमारे लिए ख़ज़ीरा नामी खाने की वस्तु बनाने का आदेश दिया, जो बनाया गया। हमारे सामने एक थाली खजूर भी लाई गई। (क़ुतैबा ने ख़जूर की थाली लाने की बात नहीं कही है।) फिर अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का आगमन हुआ, तो फ़रमाया : “क्या तुम्हें कुछ मिला है? -अथवा तुम्हारे लिए किसी चीज़ का आदेश दिया गया है?-” हमने कहा : हाँ, ऐ अल्लाह के रसूल! वह कहते हैं : हम लोग अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ बैठे ही हुए थे कि एक चरवाहा अपनी बकरियों को लेकर बाड़ा की तरफ़ निकला। उसके साथ एक छोटा बच्चा भी था, जो मिमिया रहा था। आपने उससे पूछा : “ऐ अमुक, क्या पैदा हुआ है?” उसने उत्तर दिया : मादा। आपने कहा : उसकी जगह पर हमारे लिए एक बकरी ज़बह कर दो।” फिर फ़रमाया : “तुम यह न समझो कि हमने तुम्हारे कारण ज़बह किया है, बल्कि हमारे पास सौ बकिरयाँ हैं और हम नहीं चाहते कि उससे ज़्यादा हों, इसलिए जब कोई बच्चा पैदा होता है, तो हम उसकी जगह एक बकरी ज़बह कर देते हैं। वह कहते हैं कि मैंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, मेरी पत्नी बदज़ुबान है। तो आपने कहा : “उसे तलाक़ दे दो।” वहते हैं कि मैंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, वह मेरे पास बहुत दिनों से है और उससे मुझे बच्चे भी हैं? तो फ़रमाया : “उसे समझाओ। यदि उसमें कोई भलाई है, तो समझाने से सुधर जाएगी। देखा, अपनी पत्नी को उस तरह न मारना, जिस तरह दासी को मारते हो।” मैंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, मुझे वज़ू के बारे में बताईए। तो फ़रमाया : “वज़ू सम्पूर्ण रूप से करो और उंग्लियों के बीच ख़िलाल करो तथा यदि रोज़े से न हो तो नाक में पानी डालकर अच्छी तरह से नाक झाड़ो।”इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है। - इसे दारिमी ने रिवायत किया है।
अबुल असवद कहते हैं कि मैं मदीने आया तो उमर बिन खत्ताब (रज़ियल्लाहु अनहु) के पास बैठा। इसी बीच एक जनाज़ा वहां से गुज़रा तो उस मृतक की प्रशंसा की गई। उमर ने कहा: अनिवार्य हो गई। फिर दूसरा जनाज़ा गुज़रा तो उसकी भी प्रशंसा की गई। उमर ने कहा: वाजिब हो गई। फिर तीसरा जनाज़ा गुज़रा तो उसकी बुराई की गई। उमर ने कहा: अनिवार्य हो गई। मैंने कहा: ऐ अमीरुल मोमेनीन! क्या वाजिब हो गई? फ़रमाया: मैंने वही कहा है, जो अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा था: जिस मुस्लिम आदमी के बारे में चार व्यक्तियों ने भलाई की गवाही दी, अल्लाह उसे जन्नत में दाख़िल कर देगा। हमने कहा: और यदि तीन लोग गवाही दें? फ़रमाया: तीन भी। हमने कहा: और अगर दो लोग गवाहीं दें? फ़रमाया: दो भी। फिर हमने एक के गवाही देने के बारे में नहीं पूछा।इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की पत्नी, मुसलमानों की माता उम्म-ए-सलमा -रज़ियल्लाहु अनहा- से रिवायत है, वह कहती हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जिस व्यक्ति के पास क़ुरबानी का जानवर हो, जिसे वह ज़बह करने का इरादा रखता हो, तो जुल-हिज्जा का चाँद निकल आने के बाद वह क़ुरबानी से पहले अपने बालों और नाख़ुनों में से कुछ न काटे।"इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
उम्म-ए-अतिय्या रज़ियल्लाहु अनहा, जिन्होंने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हाथ पर बैअत की थी, से रिवायत है, वह कहती हैं : "हम (मासिक धर्म से) पाक होने के बाद मटमैले और पीले रंग के पानी को कुछ शुमार नहीं करती थीं।"इस ह़दीस़ को अबू दावूद ने इन शब्दों के साथ रिवायत किया है। जबकि बुख़ारी ने (بعد الطهر, अर्थात; पवित्र हो जाने के बाद) की वृद्धि के बिना रिवायत किया है
हुज़ैफ़ा (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः हमें लोगों पर तीन बातों में फ़ज़ीलत दी गई है। हमारी सफ़ों को फ़रिश्तों की सफ़ों की तरह बनाया गया है, हमारे लिए पूरी ज़मीन को मस्जिद बनाया है तथा जब पानी न मिले तो उसकी मिट्टी को हमारे लिए पवित्रता प्राप्त करने का साधन बनाया गया है तथा आपने एक और बात बताई।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
समुरा बिन जुनदुब (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: जिसने जुमे के दिन वज़ू किया, उसने सुन्नत पर अमल किया और बहुत अच्छा किया तथा जिसने स्नान किया, उसका यह कार्य उससे बेहतर है।इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है। - इसे दारिमी ने रिवायत किया है।
अम्र बिन सुलैम अंसारी कहते हैं : मैं गवाही देता हूँ कि अबू सईद ने कहा है और उन्होंने गवाही दी है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जुमे के दिन हर व्यस्क व्यक्ति पर स्नान करना अनिवार्य है तथा यह कि वह दातुन करे और मिल सके तो ख़ुशबू भी लगाए।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू बकरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से रिवायत है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: ज़माना घूमकर आज फिर उसी हालत पर आ गया है, जो हालत उस दिन थी, जिस दिन अल्लाह ने आसमान व ज़मीन को पैदा किया था। साल के बारह महीने हैं, जिनमें चार महीने हराम (जिनमें युद्ध करना हराम है) हैं: तीन लगातार हैं, यानी ज़ुल- क़ादा, ज़ुल- हिज्जा, मुहर्रम और मुज़र क़बीले का रजब, जो अंतिम जुमादा और शाबान के बीच है। फिर आपने फ़रमाया: यह कौन- सा महीना है? हमने कहा: अल्लाह और उसके रसूल ही बेहतर जानते हैं। यह सुनकर आप कुछ देर ख़ामोश रहे। हमें लगा कि शायद आप उसको कोई नया नाम देंगे। फिर फ़रमाया: क्या यह ज़ुल- हिज्जा नहीं है? हमने कहा: अवश्य! फिर आपने कहा: यह कौन- सा शहर है? हमने कहा: अल्लाह और उलके रसूल बेहतर जानते हैं! यह सुनकर आप ख़ामोश हो गए। हमें लगने लगा कि शायद आप उसे कोई नया नाम देंगे। फिर फ़रमाया: क्या यह मक्का नगर नहीं है? हमने कहा: अवश्य! फिर आपने पूछा: आज कौन- सा दिन है? हमने कहा कि अल्लाह और उसके रसूल ही बेहतर जानते हैं। यह सुनकर आप ख़ामोश रहे, जिससे हमें ख़्याल हुआ कि शायद आप उसे कोई और नाम देंगे। फिर फ़रमाया: क्या यह क़ुर्बानी का दिन नहीं है? हमने कहा: अवश्य! आपने फ़रमाया: तो जान रखो, तुम्हारा ख़ून, तुम्हारा माल और तुम्हारी प्रतिष्ठा तुम्हारे लिए उसी तरह हराम है, जिस तरह तुम्हारा यह दिन, तुम्हारे इस नगर और तुम्हारे इस महीने में हराम है। याद रखो, जल्द ही तुमको अपने रब के सामने उपस्थित होना है और वह तुमसे तुम्हारे कर्मों के बारे में पूछेगा। सुन लो, तुम मेरे बाद दोबारा काफ़िर न हो जाना कि एक- दूसरे की गर्दन उड़ाने लगो। ख़बरदार! हर उपस्थित व्यक्ति पर लाज़िम है कि वह मेरा यह पैग़ाम उन लोगों तक पहुँचाए, जो यहाँ उपस्थित नहीं हैं। इसलिए कि बहुत मुमकिन है कि जिसके पास मेरी बात (अप्रत्यक्ष रूप से) पहुँचे, वह ऐसे कई कुछ लोगों से अधिक याद रखने वाला हो, जिन्होंने उसे (प्रत्यक्ष रूप से मुझसे) सुना है। फिर आपने फ़रमाया: सुनो, क्या मैंने पहुँचा दिया है? सुनो, क्या मैंने पहुँचा दिया है? हमने कहा: हाँ! आपने फ़रमाया: ऐ अल्लाह! तू गवाह रह!इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जब रमज़ान का महीना आता है, तो जन्नत के द्वार खोल दिए जाते हैं, जहन्नम के द्वार बंद कर दिए जाते हैं और शैतानों को बेड़ियों में जकड़ दिया जाता है।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू ज़र (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: अगर तुम महीने के तीन रोज़े रखो, तो (चाँद की) तेरहवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं तारीख़ों को रखो। क़तादा बिन मिलहान (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हमें 'सफ़ेद दिनों' अर्थात (चाँद की) तेरहवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं तारीख़ों को रोज़ा रखने का आदेश देते थे। अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अनहुमा) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) 'सफ़ेद दिनों' के रोज़े न घर में रहते हुए छोड़ते थे न सफ़र में।इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है ।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: जब नमाज़ के लिए अज़ान कही जाती है, तो शैतान हवा निकालता हुआ पीठ फेरकर भाग खड़ा होता है; ताकि अज़ान की आवाज़ न सुन सके। जब अज़ान पूरी हो जाती है, तो वापस आ जाता है। फिर जब नमाज़ के लिए इक़ामत कही जाती है, तो पीठ फेरकर भाग जाता है। जब इक़ामत ख़त्म हो जाती है, तो फिर सामने आ जाता है, ताकि नमाज़ी के ध्यान को भंग कर सके। वह कहता है: यह बात याद कर, वह बात याद कर। (यानी वह बातें जो पहले नमाज़ी को याद नहीं थीं) यहाँ तक कि आदमी को यह याद नहीं रहता कि उसने कितनी रकात नमाज़ पढ़ी है।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
मुआज़ा अदविय्या कहती हैं कि मैंने आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) से पूछा: क्या अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हर महीने तीन रोज़े रखा करते थे? उन्होंने उत्तर दिया: हाँ। मैंने पूछा: आप महीने के किस भाग में रोज़ा रखते थे? उन्होंने उत्तर दिया: आपको इसकी परवाह नहीं थी कि महीने के किस भाग में रोज़े रखे जाएँ।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
मुआविया -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को यह फरमाते हुए सुना है : "क़यामत के दिन अज़ान देने वालों की गर्दनें सबसे ऊँची होंगी।"इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अनहुमा) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आशूरा के दिन (मुहर्रम की दसवीं तारीख़ को) रोज़ा रखा और उस दिन रोज़ा रखने का आदेश भी दिया।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
शुरैह बिन हानी कहते हैं कि मैं आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) के पास, उनसे मोज़ों पर मसह करने की अवधि पूछने के लिए आया, तो उन्होंने बताया: तुम अली बिन अबू तालिब (रज़ियल्लाहु अनहु) के पास जाओ और उनसे पूछो; क्योंकि वह अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ सफ़र किया करते थे। हमने उनसे पूछा, तो बताया: अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने यात्री के लिए तीन दिन तीन रात और ठहरे हुए व्यक्ति के लिए एक दिन एक रात की अवधि निर्धारित की है।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) से वर्णित है कि उन्होंने कहा: क्या मैं तुम्हें अपनी और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की एक घटना न सुनाऊँ? हमने कहा: अवश्य सुनाएँ! वर्णनकर्ता का कहना है कि वह कहने लगीं: एक दिन मेरी बारी में अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मेरे पास थे। इसी बीच आपने करवट बदली, अपनी चादर तथा जूतों को उतारकर अपने पैरों के पास रख लिए और अपनी लुंगी के किनारे को बिस्तर पर बिछाकर लेट गए। बस इतनी देर गुज़रने के बाद कि आपको लगा कि मैं सो चुकी हूँ, आपने धीरे से अपनी चादर ली, धीरे से जूता पहना, द्वार खोलकर निकले और धीरे से बंद कर दिया। यह देख मैंने अपनी चादर को सर पर डाल लिया, तहबंद पहन लिया और आपके पीछे- पीछे चल पड़ी। आप बक़ी क़ब्रिस्तान आकर खड़े हो गए और देर तक खड़े रहे। फिर तीन बार अपने हाथों को उठाया (तथा दुआ की) और वापस चल दिए। मैं भी लौट पड़ी। आप तेज़ चलने लगे, तो मैं भी तेज़ चलने लगी। आप दौड़ने लगे, तो मैं भी दौड़ने लगी। इस तरह आप घर पहुँचे, तो मैं भी पहुँच गई। परन्तु, मैं आपसे पहले पहुँची और घर के अंदर प्रवेश कर गई। अभी मैं लेट ही पाई थी कि आप भी आ गए। आपने फ़रमाया: ऐ आइशा! बात क्या है, तुम्हारी साँस क्यों फूल रही है? वर्णनकर्ता का कहना है कि उन्होंने कहा: कुछ नहीं है। आपने फ़रमाया: तुम मुझे बताओगी या मुझे सूक्ष्मदर्शी तथा सबकी ख़बर रखने वाला अल्लाह बताएगा? वह कहती हैं कि मैंने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल! आप पर मेरे माँ- बाप क़ुर्बान हों! फिर मैंने सब कुछ कह सुनाया। आपने फ़रमाया: तो तुम ही वह परछाँई हो, जिसे मैं अपने आगे देख रहा था? मैंने कहा: हाँ। इसपर आपने मेरे सीने पे ऐसा घूँसा जमाया कि मुझे दर्द का अनुभव हुआ। फिर फ़रमाया: क्या तुमको लगता है कि अल्लाह और उसका रसूल तुम्हारा हक़ मार लेंगे? उन्होंने कहा: लोग चाहे जितना छुपाएँ, अल्लाह तो जान ही लेता है। आपने कहाः सच कहती हो। दरअसल, जिबरील (अलैहिस्सलाम) मेरे पास आए थे, जब तुमने मुझे जाते देखा। उन्होंने मुझे तुमसे छिपाते हुए पुकारा और मैंने तुमसे छुपाते हुए उत्तर दिया। वैसे, वह तुम्हारे पास उस समय नहीं आते, जब तुम कपड़े उतार देती हो। मैंने समझा कि तुम सो चुकी हो, इसलिए मैंने तुम्हें जगाना मुनासिब न जाना। मुझे इस बात का भी भय था कि तुम्हें अकेले में डर महसूस होगा। फिर जिबरील ने कहा: आपका रब आपको आदेश देता है कि बक़ी वालों के पास जाएँ और उनके लिए क्षमा याचना करें। आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) का कहना है कि मैंने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल! मैं उनके लिए किन शब्दों में दुआ करूँ? आपने फ़रमाया, कहो: السلام على أهل الديار من المؤمنين والمسلمين، ويرحم الله المستقدمين منا والمستأخرين، وإنا إن شاء الله بكم للاحقون अर्थात, इस स्थान में निवास करने वाले मोमिनों और मुसलमानों पर सलामती हो, अल्लाह हममें से पहले जाने वालों और बाद में आने वालों पर दया करे, अल्लाह ने चाहा तो हम भी तुमसे आ मिलने वाले हैं।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: जुमे के दिन फ़रिश्ते मस्जिद के द्वार पर खड़े हो जाते हैं और सिलसिलेवार मस्जिद में आने वालों के नाम लिखते जाते हैं। सबसे पहले मस्जिद में प्रवेश करने वाले की मिसाल उस व्यक्ति की तरह है, जिसने ऊँट की क़ुर्बानी दी हो, फिर उसकी तरह जिसने गाय की क़ुर्बानी दी हो, फिर मेंढे की, फिर मुर्गी की और फिर अंडे की। जब इमाम प्रवचन के लिए निकल आता है, तो वे अपने रजिस्टर समेट लेते हैं और प्रवचन सुनने लगते हैं।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु् अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: जब आदम की संतान सजदे वाली आयत पढ़ती है और सजदा करती है, तो शैतान रोता हुआ दूर हट जाता है। वह कहता है: हाय मेरी बरबादी! आदम की संतान को सजदे का आदेश दिया गया और उसने सजदा किया, तो उसके लिए जन्नत है, जबकि मुझे सजदे का आदेश दिया गया, तो मैंने इनकार कर दिया, अतः मेरे लिए जहन्नम है।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: जिसने सूरज निकलने से पहले सुबह की एक रकात पाई, उसने सुबह की नमाज़ पा ली और जिसने सूरब डूबने से पहले अस्र की एक रकात पाई, उसने अस्र की नमाज़ पा ली।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।