Hadith for the World
नमाज़

नफ़ल नमाज़

40 hadiths

40 hadiths

अली -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैंः वित्र फ़र्ज़ नमाज़ों की तरह अनिवार्य नहीं है। लेकिन, यह सुन्नत है। इसे अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने सुन्नत क़रार दिया है।इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।
आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है, वह फ़रमाती हैं : “नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रात को तेरह रकअत नमाज़ पढ़ते थे, उन्हीं में वित्र और फज्र की दो रकअतें (सुन्नत) भी शामिल होती थीं ।”इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है, उन्होंने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुझ से फ़रमाया : “ऐ अब्दुल्लाह! फलाँ आदमी की तरह न हो जाना कि वह रात को (नमाज़ के लिए) उठा करता था, फिर उसने रात में क़याम करना छोड़ दिया ।”इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अली बिन अबू तालिब -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : “ऐ क़ुरआन वालो ! वित्र पढ़ा करो, निश्चित ही अल्लाह वित्र (विषम) है तथा वित्र को पसंद करता है।”इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।
अबू सईद खुदरी -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “सुबह होने से पहले वित्र की नमाज़ पढ़ लो।”इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू सईद ख़ुदरी -रज़ियल्लाहु अन्हु- से मरफूअन रिवायत है : “जो सोया रह जाए और वित्र न पढ़ सके, अथवा भूल जाए, तो उसे चाहिए कि जब याद आए तब पढ़ ले।”इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।
जाबिर -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : “जिसको यह डर हो कि वह रात के अंतिम भाग में नहीं उठ पाएगा तो उसे चाहिए कि प्रथम भाग में ही वित्र पढ़ ले, और जिसे गुमान हो कि वह अंतिम भाग में उठ जाएगा उसे चाहिए कि रात के अंतिम भाग में ही वित्र पढ़े, क्योंकि रात के अंतिम भाग में नमाज़ पढ़ना (फरिश्तों इत्यादि के) हाजिर होने का समय है, तथा यह बेहतर है।”इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) का वर्णन है, वह कहती हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) चाश्त की नमाज़ चार रकअत पढ़ा करते थे, और जितना अल्लाह चाहता उतना उसमें ज्यादा करते।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
ज़ैद बिन साबित -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने मस्जिद में चटाई घेर कर एक (कमरा) बना लिया, आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- उस में अनेक रातों तक नमाज़ पढ़ते रहे, यहाँ तक कि कुछ लोग भी जमा होने लगे, एक रात उन लोगों ने आप (-सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-) की आवाज़ नहीं सुनी तो उन्हें लगा कि आप सो गए हैं, अतः कुछ लोग खंखारने लगे ताकि आप बाहर निकलें, तो आप ने फ़रमाया : “तुम जो कर रहे थे मैं उस से अवगत था (किंतु इस लिए नहीं निकला कि) कहीं तुम पर यह नमाज़ फर्ज़ न कर दी जाए, और यदि तुम पर इस को फर्ज़ कर दिया गया, तो तुम इस को अदा करने में असमर्थ रहोगे, अतः ऐ लोगो ! अपने अपने घरों में (तहज्जुद अथवा तरावीह की) नमाज़ पढ़ लिया करो, क्योंकि मनुष्य की सर्श्रेष्ठ नमाज़ उस के घर में होती है, सिवाय फर्ज़ नमाज़ों के।”इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू क़तादा सलमी रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जब तुममें से कोई मस्जिद के अंदर प्रवेश करे, तो बैठने से पहले दो रकातें पढ़ ले।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «من قام رمضان إيمانًا واحتسابًا غفر له ما تقدم من ذنبه».متفق عليه
عن نُبَيشة الهُذَلي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: «أيام التشريق أيام أكل وشرب».رواه مسلم
عن النعمان بن سالم عن عمرو بن أوس عن عنبسة بن أبي سفيان عن أم حبيبة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أنها قالت: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: «ما من عبد مسلم يصلي لله كل يوم ثنتي عشرة ركعةً تطوعًا غير فريضة إلا بنى الله له بيتًا في الجنة، أو إلا بني له بيت في الجنة» قالت أم حبيبة: فما برحت أصليهن بعد. وقال عمرو: ما برحت أصليهن بعد. وقال النعمان مثل ذلك.رواه مسلم
عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: «إذا قضى أحدكم الصلاة في مسجده فليجعل لبيته نصيبًا من صلاته، فإن الله جاعلٌ في بيته من صلاته خيرًا».رواه مسلم
عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا قام من الليل ليصلي افتتح صلاته بركعتين خفيفتين.رواه مسلم
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बिलाल (रज़ियल्लाहु अन्हु) से फ़ज्र की नमाज़ के समय कहा : "ऐ बिलाल, मुझे बताओ कि तुमने इस्लाम में सबसे आशा दिलाने वाला कौन-सा अमल किया है, क्योंकि मैंने जन्नत में अपने आगे-आगे तुम्हारे जूतों की आहट सुनी है?" उन्होंने उत्तर दिया : मैंने सबसे ज़्यादा आशा दिलाने वाला जो काम किया है, वह यह है कि मैंने रात या दिन के समय जब भी वज़ू किया है, उस वुज़ू से जितनी नमाज़ मेरे नसीब में लिखी होती है, ज़रूर पढ़ी है।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है