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All hadiths
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पवित्र क़ुरआन तथा उससे संबंधित अन्य विषय
26
हदीस तथा उससे संबंधित अन्य विषय
3
अक़ीदा
135
फ़िक़्ह तथा उसूल-ए-फ़िक़्ह
288
फ़ज़ीलतें तथा आदाब
288
आह्वान एवं भलाई का आदेश देने तथा बुराई से रोकने का प्रबंध करना
15
सीरत एवं इतिहास
38
655 hadiths
अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से रिवायत है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमायाः "रात और दिन की नमाज़ दो-दो रकात है।"
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमायाः "रमज़ान के बाद सबसे श्रेष्ठ रोज़े अल्लाह के महीने मुहर्रम के रोज़े हैं तथा फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद सबसे उत्तम नमाज़ रात की नमाज़ है।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू अय्यूब अनसारी -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमायाः "वित्र हक़ है। अब, जो चाहे सात रकात के साथ वित्र बनाये, जो चाहे पाँच रकात रकात के साथ वित्र बनाये, जो चाहे तीन रकात के साथ वित्र बनाये और जो चाहे एक रकात के साथ वित्र बनाये।"
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।
अली -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैंः वित्र फ़र्ज़ नमाज़ों की तरह अनिवार्य नहीं है। लेकिन, यह सुन्नत है। इसे अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने सुन्नत क़रार दिया है।
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।
आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है, वह फ़रमाती हैं : “नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रात को तेरह रकअत नमाज़ पढ़ते थे, उन्हीं में वित्र और फज्र की दो रकअतें (सुन्नत) भी शामिल होती थीं ।”
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है, उन्होंने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुझ से फ़रमाया : “ऐ अब्दुल्लाह! फलाँ आदमी की तरह न हो जाना कि वह रात को (नमाज़ के लिए) उठा करता था, फिर उसने रात में क़याम करना छोड़ दिया ।”
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अली बिन अबू तालिब -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : “ऐ क़ुरआन वालो ! वित्र पढ़ा करो, निश्चित ही अल्लाह वित्र (विषम) है तथा वित्र को पसंद करता है।”
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।
अबू सईद खुदरी -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “सुबह होने से पहले वित्र की नमाज़ पढ़ लो।”
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू सईद ख़ुदरी -रज़ियल्लाहु अन्हु- से मरफूअन रिवायत है : “जो सोया रह जाए और वित्र न पढ़ सके, अथवा भूल जाए, तो उसे चाहिए कि जब याद आए तब पढ़ ले।”
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।
जाबिर -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : “जिसको यह डर हो कि वह रात के अंतिम भाग में नहीं उठ पाएगा तो उसे चाहिए कि प्रथम भाग में ही वित्र पढ़ ले, और जिसे गुमान हो कि वह अंतिम भाग में उठ जाएगा उसे चाहिए कि रात के अंतिम भाग में ही वित्र पढ़े, क्योंकि रात के अंतिम भाग में नमाज़ पढ़ना (फरिश्तों इत्यादि के) हाजिर होने का समय है, तथा यह बेहतर है।”
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) का वर्णन है, वह कहती हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) चाश्त की नमाज़ चार रकअत पढ़ा करते थे, और जितना अल्लाह चाहता उतना उसमें ज्यादा करते।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है : “जमात के साथ नमाज़ अकेले की नमाज़ से सवाब में पच्चीस दर्जे ज़्यादा है और रात दिन के फरिश्ते फज्र की नमाज़ में जमा होते हैं।” फिर अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं : अगर चाहो तो यह आयत पढ़ लो : “फज्र में क़ुरान की तिलावत पर फरिश्ते हाज़िर होते हैं।” [सूरा अल-इस्रा : 78]
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास एक अंधा व्यक्ति आया, तथा कहने लगा : ऐ अल्लाह के रसूल! मेरे पास कोई आदमी नहीं है जो मुझे मस्जिद ले आए। अतः उसने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से घर में नमाज़ पढ़ने की छूट माँगी, तो आपने (पहले तो) उसे छूट दे दी, लेकिन जब वह जाने लगा, तो उसे बुलाया और फ़रमाया : “क्या तुम नमाज़ के लिए पुकारी जाने वाली अज़ान को सुनते हो?” उसने कहा : हाँ, सुनता हूँ, तो आप ने फ़रमाया : “फिर तो तुम अवश्य उसको ग्रहण करो (अर्थाथ; माज़ पढ़ने के लिए मस्जिद आओ)।”
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
ज़ैद बिन साबित -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने मस्जिद में चटाई घेर कर एक (कमरा) बना लिया, आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- उस में अनेक रातों तक नमाज़ पढ़ते रहे, यहाँ तक कि कुछ लोग भी जमा होने लगे, एक रात उन लोगों ने आप (-सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-) की आवाज़ नहीं सुनी तो उन्हें लगा कि आप सो गए हैं, अतः कुछ लोग खंखारने लगे ताकि आप बाहर निकलें, तो आप ने फ़रमाया : “तुम जो कर रहे थे मैं उस से अवगत था (किंतु इस लिए नहीं निकला कि) कहीं तुम पर यह नमाज़ फर्ज़ न कर दी जाए, और यदि तुम पर इस को फर्ज़ कर दिया गया, तो तुम इस को अदा करने में असमर्थ रहोगे, अतः ऐ लोगो ! अपने अपने घरों में (तहज्जुद अथवा तरावीह की) नमाज़ पढ़ लिया करो, क्योंकि मनुष्य की सर्श्रेष्ठ नमाज़ उस के घर में होती है, सिवाय फर्ज़ नमाज़ों के।”
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
उक़बा बिन आमिर (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "सबसे अच्छा निकाह वह है, जो सबसे आसान हो।" तथा नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने एक व्यक्ति से कहाः "क्या तुम्हें यह पसंद होगा कि मैं अमुक स्त्री से तुम्हारा निकाह कर दूँ?" उसने कहाः हाँ! आपने उस महिला से भी कहाः "क्या तुम्हें पसंद होगा कि मैं अमुक पुरुष से तुम्हारा निकाह कर दूँ?" उसने भी कहाः हाँ! तो आपने दोनों का निकाह महर तय किए बिना ही कर दिया। फिर उसने वैवाहिक जीवन आरंभ करते समय भी अपनी पत्नी को कुछ नहीं दिया। लेकिन, जब मरने लगा, तो बोलाः अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अमुक स्त्री से मेरा निकाह कराया था और मैंने उसे कुछ नहीं दिया था। अतः, अब उसे ख़ैबर का अपना हिस्सा देता हूँ। चुनांचे, उसका ख़ैबर का जो हिस्सा था, उसे उसकी पत्नी ने उससे लेकर बेचा, तो उसकी क़ीमत एक लाख हुई।
इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः "जब तुममें से किसी को दावत-ए-वलीमा के लिए बुलाया जाए, तो उसमें ज़रूर शरीक हो।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू जुहैफा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है, वह कहते हैं कि मैं नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास था कि आपने एक व्यक्ति से, जो आपके निकट था, फ़रमायाः "मैं टेक लगाकर नहीं खाता।"
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हमा) कहते हैं कि नबी ( सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः "बरकत खाने के बीच में उतरती है। अतः, उसके दोनों किनारों से खाओ, बीच से न खाओ।"
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है। - इसे दारिमी ने रिवायत किया है।
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जब तुममें से कोई खाना खाए, तो अपने दाएँ हाथ से खाए और तुममें से कोई कुछ पिए तो अपने दाएँ हाथ से पिए। क्योंकि शैतान अपने बाएँ हाथ से खाता और बाएँ हाथ से पीता है।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने बर्तन में साँस लेने या फूँक मारने से मना किया है।
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है। - इसे दारिमी ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : “सर्वोत्तम सदका वह है जो अपनी आवश्यकता के बराबर धन बचाकर रखने के बाद किया जाए, ऊपर वाला हाथ नीचे वाले हाथ से उत्तम है और तुममें से हर व्यक्ति को चाहिए कि उससे आरंभ करे जिसके ऊपर खर्च करना उसके ऊपर वाजिब है।” (कहीं ऐसा न हो कि) उसकी पत्नी कहे : मेरे ऊपर खर्च करो, उसकी दासी जो उसके बच्चे की माँ बन चुकी हो, कहे : तुम मुझे किसके भरोसे छोड़ रहे हो? और उसका ग़ुलाम कहे कि मुझे खिलाओ तथा मुझसे काम लो।
इसे इब्ने ह़िब्बान ने रिवायत किया है । - इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।
अब्दुल्लाह बिन अम्र -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : “एक स्त्री को एक बिल्ली के कारण यातना दी गई, जिसे उसने बाँधकर रखा था, यहाँ तक कि वह मर गई। अतः वह उसके कारण जहन्नम में गई। जब उसने उसे बाँधकर रखा, तो न कुछ खाने को दिया, न पीने को दिया और न ही आज़ाद छोड़ा कि वह स्वयं धरती के कीड़े-मकोड़े खा सके।”
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है, वह नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से बयान करते हैं कि आपने फरमायाः "चोर पर अल्लाह की लानत (धिक्कार) हो, वह अंडा चुराता है तो उसका हाथ काटा जाता है तथा रस्सी चुराता है तो उसका हाथ काटा जाता है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "हर नशे वाली वस्तु शराब है और हर नशे वाली वस्तु हराम है। जिसने दुनिया में शराब पी और इसी लत के साथ तौबा किए बिना मर गया, वह आख़िरत में उससे वंचित रहेगा।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है, जबकि बुख़ारी ने इसका अंतिम वाक्य रिवायत किया है
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