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655 hadiths

अनस बिन मालिक- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः अल्लाह अपने बंदे की तौबा से उस व्यक्ति से कहीं अधिक प्रसन्न होता है, जिसने किसी मरुस्थल में अपना ऊँट गुम करके फिर पा लिया हो। तथा एक रिवायत में हैः अल्लाह अपने बंदे की तौबा से, जब वह उसके आगे तौबा करता है, उस आदमी से भी अधिक प्रसन्न होता है जो किसी मरुस्थल में अपनी सवारी पर हो, उसपर उसके खाने-पीने का सामान भी हो कि वह सवारी उससे छूट जाए और वह उससे निराश होकर एक पेड़ की छाया में लेट जाए। इसी निराशा की हालत में वह सवारी अचानक उसके सामने आ खड़ी हो और वह उसकी मुहार पकड़कर खुशी की शिद्दत में कह डालेः 'ऐ अल्लाह, तू मेरा बंदा है और मैं तेरा रब!' अत्यधिक प्रसन्नता के कारण इस तरह की गलती कर बैठे।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू मूसा रज़ियल्लाहु अन्हु अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रिवायत करते हैं कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : ''महान अल्लाह रात में हाथ फैलाता है, ताकि दिन में गुनाह करने वाला तौबा कर ले और दिन में हाथ फैलाता है, ताकि रात में गुनाह करने वाला तौबा कर ले, यहाँ तक कि सूरज अपने डूबने के स्थान से निकल आए।''इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू सईद ख़ुदरी -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है : "जो अल्लाह के पथ में एक दिन रोज़ा रखेगा, उसके चेहरे को अल्लाह (जहन्नम की) आग से सत्तर साल दूर कर देगा।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
सह्ल बिन साद -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "लोग उस समय तक भलाई में रहेंगे, जब तक इफ़तार करने में जल्दी करते रहेंगे।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
ज़ैद बिन साबित -रज़ियल्लाहु अनहु- से रिवायत है, वह कहते हैं : "हमने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ सहरी का खाना खाया, फिर नमाज के लिए चले गए। अनस कहते हैं : मैंने पूछा : अज़ान और सहरी के बीच कितना समय था? उन्होंने जवाब दिया : पचास आयतें पढ़ने के बराबर समय।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की पत्नी मुसलमानों की माता आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- का वर्णन है कि : अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- मृत्यु तक रमज़ान के अंतिम दस दिनों में एतिकाफ़ करते रहे। आपके बाद आपकी पत्नियों ने भी एतिकाफ़ किया।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "तुम लोग सहरी खाया करो, क्योंकि सहरी में बरकत है।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
जाबिर बिन अब्दुल्लाह -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक यात्रा पर थे, कि एक भीड़ देखी, जहाँ एक व्यक्ति के लिए छाँव का प्रबंध किया गया था। आपने पूछा कि : "यह क्या है?" तो लोगों ने बताया कि यह रोज़ेदार है। आपने फ़रमाया : "यात्रा में रोज़ा रखना पुण्य का कार्य नहीं है", तथा सहीह मुस्लिम की एक रिवायत में है : "तुम अल्लाह की ओर से मिली हुई छूट को सहृदय स्वीकार करो।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "रमज़ान से एक या दो दिन पहले रोज़े न रखो। परन्तु जो व्यक्ति (पहले से) रोज़े रख रहा हो, वह रख सकता है।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- से रिवायत है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने सदक़ा-ए-फ़ित्र मुसलमान ग़ुलाम और आज़ाद, मर्द और औरत, छोटे और बड़े (सब पर) एक साअ् खजूर या एक साअ् जौ फ़र्ज़ क़रार दिया है और आदेश दिया है कि उसे नमाज़ के लिए लोगों के निकलने से पहले-पहले अदा कर दिया जाए।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "किसी मुसलमान औरत के लिए जायज़ नहीं कि एक दिन एवं एक रात की यात्रा किसी महरम के बिना करे।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
आइशा और उम्मे सलमा- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- का वर्णन है कि कभी-कभी इस हाल में फ़ज्र की नमाज़ का समय आ जाता कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपनी पत्नियों से संभोग के कारण नापाकी की अवस्था में होते। फिर इसके बाद स्नान करते और रोज़ा रखते।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जो रोज़ा रख कर भूल कर खा ले अथवा पी ले, वह अपना रोज़ा पूरा करे, क्योंकि उसे अल्लाह ने खिलाया एवं पिलाया है।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : मुझे मेरे दोस्त (नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने तीन चीज़ों की वसीयत की है : हर महीना तीन दिन रोज़ा रखने, चाश्त की दो रकात नमाज़ पढ़ने और सोने से पहले वित्र पढ़ने की।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "शब-ए-क़द्र को (रमज़ान के) अंतिम दस दिनों की विषम रातों में तलाश करो।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
उमर बिन ख़त्ताब- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः जब रात्रि इधर से आ जाए और दिन उधर से चला जाए, तो जान लो कि इफ़तार का समय हो गया।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "जब तुम (रमज़ान का) चाँद देखो, तो रोज़ा रखो और जब (शव्वाल का) चाँद दखो, तो रोज़ा रखना बंद कर दो। (और) अगर आकाश बादल से ढका हुआ हो, तो उसका अंदाज़ा लगा लो। (यानी महीने के तीस दीन पूरे कर लो।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है, उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "अल्लाह तुम्हारे रूप और तुम्हारे धनों को नहीं देखता, बल्कि तुम्हारे दिलों और कर्मों को देखता है।"इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "सभी कार्यों का आधार नीयतों पर है और इन्सान को उसकी नीयत के अनुरूप ही प्रतिफल मिलेगा। अतः, जिसकी हिजरत अल्लाह और उसके रसूल के लिए होगी, उसकी हिजरत अल्लाह और उसके रसूल के लिए होगी और जिसकी हिजरत दुनिया प्राप्त करने या किसी स्त्री से शादी रचाने के लिए होगी, उसकी हिजरत उसी काम के लिए होगी, जिसके लिए उसने हिजरत की होगी।" सहीह बुख़ारी की एक रिवायत के शब्द हैं : "सभी कार्यों का आधार नीयतों पर है और प्रत्येक व्यक्ति को उसकी नीयत के अनुरूप ही प्रतिफल मिलेगा।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबुल हौरा सादी कहते हैं : मैंने हसन बिन अली रज़ियल्लाहु अनहुमा से पूछा : आपने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से क्या याद किया है? उन्होंने उत्तर दिया : मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से यह याद किया है : "जो चीज़ तुम्हें संदेह में डाले, उसे छोड़कर वह अख़्तियार करो, जो संदेह में न डाले। क्योंकि सच्चाई इत्मीनान है और झूठ शक व शुबह है।"इसे तिर्मिज़ी, नसई और अह़मद ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है, उन्होंने कहा कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "आदमी का जमात के साथ नमाज़ पढ़ना बाज़ार या घर में नमाज़ पढ़ने की तुलना में (पुण्य के मामले में) बीस से अधिक दर्जा बढ़ा हुआ होता है। इसका कारण यह है कि जब तुममें से कोई अच्छी तरह वज़ू करता है, फिर नमाज़ के इरादे से मस्जिद आता है और नमाज़ के सिवा कोई चीज़ उसे घर से नहीं निकालती, तो मस्जिद पहुँचने तक वह जो भी क़दम उठाता है, उसके बदले में उसका एक दर्जा ऊँचा होता है और एक गुनाह मिटाया जाता है। फिर जब मस्जिद में प्रवेश करता है तो जब तक नमाज़ उसे रोके रखती है, वह नमाज़ में होता है। तथा फ़रिश्ते तुममें से किसी के लिए रहमत की दुआ करते रहते हैं, जब तक वह उस जगह में होता है, जहाँ नमाज़ पढ़ी है। वे कहते रहते हैं : ऐ अल्लाह! इसपर दया कर, ऐ अल्लाह! इसे क्षमा कर दे और ऐ अल्लाह! इसकी तौबा कबूल कर। यह सिलसिला उस समय तक जारी रहता है, जब तक वहाँ किसी को कष्ट न दे, जब तक वहाँ उसका वज़ू टूट न जाए।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मेरे कंधे को पकड़ा और फ़रमाया : ‎“‎इस संसार में ऐसे रहो जैसे कि तुम एक अजनबी हो या एक मुसाफ़िर।” तथा इब्न -ए- उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा कहा करते थे : “‎जब तुम शाम करो तो सुबह की प्रतीक्षा न करो, और जब तुम सुबह करो तो शाम की प्रतीक्षा न करो, अपने स्वास्थ्य से अपने रोग के समय के लिए और अपने जीवन से अपनी मृत्यु के समय के लिए कुछ तैयारी कर लो।‎”‎इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : “आपस में ईर्ष्या मत करो, क्रय-विक्रय में एक दूसरे से छल मत करो, एक-दूसरे से घृणा मत करो, एक-दूसरे से मुख मत फेरो तथा किसी के व्यापार पर व्यापार मत करो। अल्लाह के बंदों, आपस में भ्रातृत्व भाव (भाई-चारे) से रहो। मुसलमान, मुसलमान का भाई है। वह न तो उस पर अत्याचार करता है, न उसे अपमानित करता है, न उसे तुच्छ समझता है। तक़वा यहाँ है (यह कहते समय आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने सीने की ओर तीन बार इशारा किया)। किसी व्यक्ति के बुरा होने के लिए यह पर्याप्त है कि वह अपने मुस्लिम भाई को तुच्छ समझे। प्रत्येक मुसलमान का रक्त, संपत्ति एवं मान-सम्मान दूसरे मुसलमान पर हराम है।”इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है : एक व्यक्ति ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कहा कि मुझे वसीयत कीजिए, तो आपने फ़रमाया : "गुस्सा मत किया करो।" उसने कई बार अपनी बात दोहराई और आपने हर बार यही कहा कि "गुस्सा मत किया करो।"इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है