Hadith for the World
इबादतों पर आधारित फ़िक़्ह

रोज़े

40 hadiths

40 hadiths

अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अनहुमा) से रिवायत है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः यदि अगले साल तक जीवित रहा, तो मुहर्रम महीने की नौवीं तारीख़ का रोज़ा रखूँगा।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
ज़ैद बिन ख़ालिद जुहनी (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः जो किसी रोज़ेदार को इफ़तार करवाता है, उसे भी रोज़ा रखने वाले के समान नेकी मिलती है और रोज़ेदार की नेकी में कोई कमी नहीं की जाती है।इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है। - इसे दारिमी ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जब रमज़ान का महीना आता है, तो जन्नत के द्वार खोल दिए जाते हैं, जहन्नम के द्वार बंद कर दिए जाते हैं और शैतानों को बेड़ियों में जकड़ दिया जाता है।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू ज़र (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: अगर तुम महीने के तीन रोज़े रखो, तो (चाँद की) तेरहवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं तारीख़ों को रखो। क़तादा बिन मिलहान (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हमें 'सफ़ेद दिनों' अर्थात (चाँद की) तेरहवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं तारीख़ों को रोज़ा रखने का आदेश देते थे। अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अनहुमा) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) 'सफ़ेद दिनों' के रोज़े न घर में रहते हुए छोड़ते थे न सफ़र में।इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है ।
मुआज़ा अदविय्या कहती हैं कि मैंने आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) से पूछा: क्या अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हर महीने तीन रोज़े रखा करते थे? उन्होंने उत्तर दिया: हाँ। मैंने पूछा: आप महीने के किस भाग में रोज़ा रखते थे? उन्होंने उत्तर दिया: आपको इसकी परवाह नहीं थी कि महीने के किस भाग में रोज़े रखे जाएँ।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अनहुमा) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आशूरा के दिन (मुहर्रम की दसवीं तारीख़ को) रोज़ा रखा और उस दिन रोज़ा रखने का आदेश भी दिया।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अब्दुल्लाह बिन अमर रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "इस्लाम की बुनियाद पाँच चीज़ों पर क़ायम है : इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ स्थापित करना, ज़कात देना, हज करना और रमज़ान मास के रोज़े रखना।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
عن أبي هريرة رضي الله عنه قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم أو قال: قال أبو القاسم صلى الله عليه وسلم: «صوموا لرؤيته وأفطروا لرؤيته، فإن غبي عليكم فأكملوا عدة شعبان ثلاثين».متفق عليه، واللفظ للبخاري
عن ابن عمر قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أفطر قال: "ذهب الظمأُ، وابتلت العروق، وثبت الأجر إن شاء الله".رواه أبو داود
عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «من قام رمضان إيمانًا واحتسابًا غفر له ما تقدم من ذنبه».متفق عليه
عن عائشة رضي الله عنها قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصوم حتى نقول: لا يفطر، ويفطر حتى نقول: لا يصوم، فما رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم استكمل صيام شهر إلا رمضان، وما رأيته أكثر صيامًا منه في شعبان.متفق عليه
عن نُبَيشة الهُذَلي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: «أيام التشريق أيام أكل وشرب».رواه مسلم
عن أبي أيوب الأنصاري رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «من صام رمضان ثم أتبعه ستًّا من شوال كان كصيام الدهر».رواه مسلم
عن أم المؤمنين عائشة رضي الله عنها قالت: دخل علي النبي صلى الله عليه وسلم ذات يوم فقال: «هل عندكم شيء؟» فقلنا: لا. قال: «فإني إذن صائم» ثم أتانا يومًا آخر فقلنا: يا رسول الله، أهدي لنا حيس. فقال: «أَرِينيه، فلقد أصبحت صائمًا» فأكل.رواه مسلم
عَنْ أَبِي قَتَادَةَ أَنَّ رَجُلًا أَتَى النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَقَالَ: كَيْفَ تَصُومُ؟ فَغَضِبَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَلَمَّا رَأَى عُمَرُ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ غَضَبَهُ، قَالَ: رَضِينَا بِاللهِ رَبًّا، وَبِالْإِسْلَامِ دِينًا، وَبِمُحَمَّدٍ نَبِيًّا، نَعُوذُ بِاللهِ مِنْ غَضَبِ اللهِ وَغَضَبِ رَسُولِهِ، فَجَعَلَ عُمَرُ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ يُرَدِّدُ هَذَا الْكَلَامَ حَتَّى سَكَنَ غَضَبُهُ، فَقَالَ عُمَرُ: يَا رَسُولَ اللهِ، كَيْفَ بِمَنْ يَصُومُ الدَّهْرَ كُلَّهُ؟ قَالَ: «لَا صَامَ وَلَا أَفْطَرَ» -أَوْ قَالَ «لَمْ يَصُمْ وَلَمْ يُفْطِرْ»- قَالَ: كَيْفَ مَنْ يَصُومُ يَوْمَيْنِ وَيُفْطِرُ يَوْمًا؟ قَالَ: «وَيُطِيقُ ذَلِكَ أَحَدٌ؟» قَالَ: كَيْفَ مَنْ يَصُومُ يَوْمًا وَيُفْطِرُ يَوْمًا؟ قَالَ: «ذَاكَ صَوْمُ دَاوُدَ عَلَيْهِ السَّلَام» قَالَ: كَيْفَ مَنْ يَصُومُ يَوْمًا وَيُفْطِرُ يَوْمَيْنِ؟ قَالَ: «وَدِدْتُ أَنِّي طُوِّقْتُ ذَلِكَ» ثُمَّ قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «ثَلَاثٌ مِنْ كُلِّ شَهْرٍ، وَرَمَضَانُ إِلَى رَمَضَانَ، فَهَذَا صِيَامُ الدَّهْرِ كُلِّهِ، صِيَامُ يَوْمِ عَرَفَةَ، أَحْتَسِبُ عَلَى اللهِ أَنْ يُكَفِّرَ السَّنَةَ الَّتِي قَبْلَهُ، وَالسَّنَةَ الَّتِي بَعْدَهُ، وَصِيَامُ يَوْمِ عَاشُورَاءَ، أَحْتَسِبُ عَلَى اللهِ أَنْ يُكَفِّرَ السَّنَةَ الَّتِي قَبْلَهُ».رواه مسلم
عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «مَنْ لَمْ يَدَعْ قَوْلَ الزُّورِ وَالعَمَلَ بِهِ فَلَيْسَ لِلَّهِ حَاجَةٌ فِي أَنْ يَدَعَ طَعَامَهُ وَشَرَابَهُ».رواه البخاري