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रोज़े
नफ़ल रोज़े
12 hadiths
وجوب الصيام وحكم تاركه
1
रोज़े की फ़ज़ीलत
5
रोज़े की सुन्नतें
7
चाँद देखना
2
संदेह वाले दिन का रोज़ा
2
उज़्र वाले लोगों के रोज़े
1
रोज़ा तोड़ देने वाली वस्तुएँ
2
रोज़ेदार के लिए अनिवार्य कार्य
1
रोज़ेदार के लिए जायज़ कार्य
1
नफ़ल रोज़े
12
ऐतिकाफ़
1
रमज़ान के अंतिम दस दिन
4
रमज़ान
2
12 hadiths
अबू सईद ख़ुदरी -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है : "जो अल्लाह के पथ में एक दिन रोज़ा रखेगा, उसके चेहरे को अल्लाह (जहन्नम की) आग से सत्तर साल दूर कर देगा।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : मुझे मेरे दोस्त (नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने तीन चीज़ों की वसीयत की है : हर महीना तीन दिन रोज़ा रखने, चाश्त की दो रकात नमाज़ पढ़ने और सोने से पहले वित्र पढ़ने की।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "सोमवार तथा बृहस्पतिवार को सारे आमाल पेश किए जाते हैं। अतः मैं पसंद करता हूँ कि मेरे कार्य इस दशा में पेश हों कि मैं रोज़े से रहूँ।" एक रिवायत में है : "सोमवार तथा बृहस्पतिवार को जन्नत के द्वार खोले जाते हैं और प्रत्येक उस व्यक्ति को क्षमा कर दिया जाता है, जो अल्लाह के साथ किसी को साझी नहीं बनाता, सिवाय उस व्यक्ति के जिसके तथा उसके भाई के बीच में ईर्ष्या हो। ऐसे में कहा जाता है : इन दोनों ज़रा मोहलत दो, ताकि आपस में समझौता कर लें।" एक और रिवायत में है : "सोमवार तथा बृहस्पतिवार को सारे आमाल पेश किए जाते हैं। अतः, प्रत्येक उस व्यक्ति को क्षमा कर दिया जाता है, जो अल्लाह के साथ किसी को साझी नहीं बनाता, सिवाय उसके जिसके तथा उसके भाई के बीच में ईर्ष्या हो। ऐसे में वह कहता है : इन दोनों को छोड़ दो, यहाँ तक कि आपस मे समझौता कर लें।"
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
आइशा (रज़ियल्लाहु अनहु) कहती हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) किसी महीने में शाबान से अधिक रोज़ा (उपवास) नहीं रखते थे। आप पूरे शाबान महीने का रोज़ा रखते थे। एक रिवायत में हैः शाबान के कुछ ही दिनों का रोज़ा नहीं रखते थे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अनहुमा) से रिवायत है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः यदि अगले साल तक जीवित रहा, तो मुहर्रम महीने की नौवीं तारीख़ का रोज़ा रखूँगा।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू ज़र (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: अगर तुम महीने के तीन रोज़े रखो, तो (चाँद की) तेरहवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं तारीख़ों को रखो। क़तादा बिन मिलहान (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हमें 'सफ़ेद दिनों' अर्थात (चाँद की) तेरहवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं तारीख़ों को रोज़ा रखने का आदेश देते थे। अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अनहुमा) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) 'सफ़ेद दिनों' के रोज़े न घर में रहते हुए छोड़ते थे न सफ़र में।
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है ।
मुआज़ा अदविय्या कहती हैं कि मैंने आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) से पूछा: क्या अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हर महीने तीन रोज़े रखा करते थे? उन्होंने उत्तर दिया: हाँ। मैंने पूछा: आप महीने के किस भाग में रोज़ा रखते थे? उन्होंने उत्तर दिया: आपको इसकी परवाह नहीं थी कि महीने के किस भाग में रोज़े रखे जाएँ।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अनहुमा) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आशूरा के दिन (मुहर्रम की दसवीं तारीख़ को) रोज़ा रखा और उस दिन रोज़ा रखने का आदेश भी दिया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
عن عائشة رضي الله عنها قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصوم حتى نقول: لا يفطر، ويفطر حتى نقول: لا يصوم، فما رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم استكمل صيام شهر إلا رمضان، وما رأيته أكثر صيامًا منه في شعبان.
متفق عليه
عن أبي أيوب الأنصاري رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «من صام رمضان ثم أتبعه ستًّا من شوال كان كصيام الدهر».
رواه مسلم
عن أم المؤمنين عائشة رضي الله عنها قالت: دخل علي النبي صلى الله عليه وسلم ذات يوم فقال: «هل عندكم شيء؟» فقلنا: لا. قال: «فإني إذن صائم» ثم أتانا يومًا آخر فقلنا: يا رسول الله، أهدي لنا حيس. فقال: «أَرِينيه، فلقد أصبحت صائمًا» فأكل.
رواه مسلم
عَنْ أَبِي قَتَادَةَ أَنَّ رَجُلًا أَتَى النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَقَالَ: كَيْفَ تَصُومُ؟ فَغَضِبَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَلَمَّا رَأَى عُمَرُ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ غَضَبَهُ، قَالَ: رَضِينَا بِاللهِ رَبًّا، وَبِالْإِسْلَامِ دِينًا، وَبِمُحَمَّدٍ نَبِيًّا، نَعُوذُ بِاللهِ مِنْ غَضَبِ اللهِ وَغَضَبِ رَسُولِهِ، فَجَعَلَ عُمَرُ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ يُرَدِّدُ هَذَا الْكَلَامَ حَتَّى سَكَنَ غَضَبُهُ، فَقَالَ عُمَرُ: يَا رَسُولَ اللهِ، كَيْفَ بِمَنْ يَصُومُ الدَّهْرَ كُلَّهُ؟ قَالَ: «لَا صَامَ وَلَا أَفْطَرَ» -أَوْ قَالَ «لَمْ يَصُمْ وَلَمْ يُفْطِرْ»- قَالَ: كَيْفَ مَنْ يَصُومُ يَوْمَيْنِ وَيُفْطِرُ يَوْمًا؟ قَالَ: «وَيُطِيقُ ذَلِكَ أَحَدٌ؟» قَالَ: كَيْفَ مَنْ يَصُومُ يَوْمًا وَيُفْطِرُ يَوْمًا؟ قَالَ: «ذَاكَ صَوْمُ دَاوُدَ عَلَيْهِ السَّلَام» قَالَ: كَيْفَ مَنْ يَصُومُ يَوْمًا وَيُفْطِرُ يَوْمَيْنِ؟ قَالَ: «وَدِدْتُ أَنِّي طُوِّقْتُ ذَلِكَ» ثُمَّ قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «ثَلَاثٌ مِنْ كُلِّ شَهْرٍ، وَرَمَضَانُ إِلَى رَمَضَانَ، فَهَذَا صِيَامُ الدَّهْرِ كُلِّهِ، صِيَامُ يَوْمِ عَرَفَةَ، أَحْتَسِبُ عَلَى اللهِ أَنْ يُكَفِّرَ السَّنَةَ الَّتِي قَبْلَهُ، وَالسَّنَةَ الَّتِي بَعْدَهُ، وَصِيَامُ يَوْمِ عَاشُورَاءَ، أَحْتَسِبُ عَلَى اللهِ أَنْ يُكَفِّرَ السَّنَةَ الَّتِي قَبْلَهُ».
رواه مسلم