135 hadiths
इयाज़ बिन हिमार मुजाशिई (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि एक दिन अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने संबोधन में फ़रमाया: सुन लो, मेरे रब ने मुझे आदेश दिया है कि उसने आज मुझे जो बातें सिखाई हैं, उनमें से वह बातें मैं तुम्हें बता दूँ, जो तुम नहीं जानते। (अल्लाह तआला का फ़रमान है) हर वह माल, जो मैंने अपने बंदे को दिया है, वह उसके लिए हलाल है। मैंने अपने सारे बंदों को एक अल्लाह की वंदना करने वाला बनाकर पैदा किया है। फिर शैतान उनके पास आए और उन्हें उनके धर्म से बहकाने लगे। उनपर वह चीज़ें हराम कर दीं, जो मैंने उनके लिए हलाल की थीं। उन्हें आदेश दिया कि उन चीज़ों को मेरा साझी ठहराएँ, जिनके साझी होने की कोई दलील मैंने नहीं उतारी है। अल्लाह ने धरती की ओर देखा, तो कुछ बचे- खुचे अह्ले किताब (यहूदी और ईसाई) को छोड़कर उनके अरब तथा ग़ैरअरब सबसे नाराज़ हुआ तथा फ़रमाया: मैंने तुम्हें इसलिए भेजा है, ताकि तुम्हें आज़माऊँ और तुम्हारे द्वारा अन्य लोगों को भी। मैंने तुमपर एक ऐसी किताब उतारी है, जिसे पानी धो नहीं सकता। तुम उसे सोते- जागते पढ़ते हो। अल्लाह ने मुझे आदेश दिया है कि मैं क़ुरैश को जला डालूँ। मैंने कहा: ऐ मेरे रब! तब तो वे मेरे सर को कुचलकर रोटी बना देंगे। अल्लाह ने कहा: उन्हें निकालो, जैसे उन्होंने तुम्हें निकाला, उनसे युद्ध करो, हम तुम्हें युद्ध करने की शक्ति प्रदान करेंगे, ख़र्च करो, हम तुमपर ख़र्च करेंगे, तुम सेना भेजो, हम उस जैसी पाँच सेनाएँ भेजेंगे तथा अपने मानने वालों को साथ लेकर उन लोगों से युद्ध करो, जो नहीं मानते। अल्लाह ने कहा: जन्नती तीन प्रकार के लोग होंगे: न्यायकारी, सदक़ा करने वाला और अल्लाह की ओर से सत्य पर चलने का सामर्थ्य प्राप्त किया हुआ बादशाह, सभी रिश्तेदारों तथा मुसलमानों के लिए नर्म दिल तथा दयालु व्यक्ति एवं पाकदामन और माँगने से बचने वाला परिवार वाला। अल्लाह ने कहा: जहन्नम में पाँच प्रकार के लोग दाख़िल होंगे: बुद्धिहीन कमज़ोर जो तुम्हारे अधीन हो और परिवार तथा धन की चाहत न रखता हो, ऐसा छल करने वाला, जिसका लालच छुपा नहीं रहता, छोटी से छोटी चीज़ के बारे में भी छल करने पर उतर आता हो और ऐसा व्यक्ति, जो तुम्हें सुबह व शाम तुम्हारे परिवार तथा धन के बारे में धोखा दे। तथा कंजूस अथवा झूठे व्यक्ति और ऐसे बदचलन एवं अशिष्ट आदमी का भी ज़िक्र किया, जो गंदी तथा अश्लील भाषा प्रयोग करता हो।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अनहुमा) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) यह दुआ किया करते थेः «ربِّ أَعِنِّي ولا تُعِن عليَّ، وانصرني ولا تنصر عليَّ، وامكر لي ولا تمكر عليَّ، واهدني ويسِّر هُدايَ إليَّ، وانصرني على مَن بغى عليَّ، اللهم اجعلني لك شاكرًا، لك ذاكرًا، لك راهبًا، لك مِطواعًا، إليك مُخْبِتًا، أو مُنِيبا، رب تقبَّل توبتي، واغسل حَوْبتي، وأجب دعوتي، وثبِّت حُجَّتي، واهدِ قلبي، وسدِّد لساني، واسْلُلْ سَخِيمةَ قلبي». अर्थात, ऐ मेरे रब! मेरी सहायता कर और मेरे विरुद्ध सहायता न कर, मुझे विजय प्रदान कर और किसी को मेरे विरुद्ध विजय प्रदान न कर, मेरे हक़ में योजना बना तथा मेरे विरुद्ध योजना मत बना, मुझे सच्चाई के रास्ते पर चला और सच्चाई के रास्ते पर चलना मेरे लिए आसान कर तथा मेरे विरुद्ध विपलव करने वाले पर मुझे विजयी बना। ऐ अल्लाह! मुझे अपना शुक्र अदा करने वाला, अपना ज़िक्र करने वाला, अपने से डरने वाला, अपना अनुकरण करने वाला और अपने आगे झुकने वाला या अपनी ओर लौटने वाला बना। ऐ मेरे रब! मेरी तौबा क़बूल कर, मेरे गुनाह धो दे, मेरी दुआ क़बूल कर, मेरी दलील को सिद्ध कर, मेरे दिल को सच्चा रास्ता दिखा, मेरी ज़बान को दुरुस्त रख और मेरे दिल के मैल- कुचैल को निकाल दे।इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।