Hadith for the World
Topic

फ़िक़्ह तथा उसूल-ए-फ़िक़्ह

288 hadiths

288 hadiths

अबू ज़र (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: अगर तुम महीने के तीन रोज़े रखो, तो (चाँद की) तेरहवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं तारीख़ों को रखो। क़तादा बिन मिलहान (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हमें 'सफ़ेद दिनों' अर्थात (चाँद की) तेरहवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं तारीख़ों को रोज़ा रखने का आदेश देते थे। अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अनहुमा) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) 'सफ़ेद दिनों' के रोज़े न घर में रहते हुए छोड़ते थे न सफ़र में।इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है ।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: जब नमाज़ के लिए अज़ान कही जाती है, तो शैतान हवा निकालता हुआ पीठ फेरकर भाग खड़ा होता है; ताकि अज़ान की आवाज़ न सुन सके। जब अज़ान पूरी हो जाती है, तो वापस आ जाता है। फिर जब नमाज़ के लिए इक़ामत कही जाती है, तो पीठ फेरकर भाग जाता है। जब इक़ामत ख़त्म हो जाती है, तो फिर सामने आ जाता है, ताकि नमाज़ी के ध्यान को भंग कर सके। वह कहता है: यह बात याद कर, वह बात याद कर। (यानी वह बातें जो पहले नमाज़ी को याद नहीं थीं) यहाँ तक कि आदमी को यह याद नहीं रहता कि उसने कितनी रकात नमाज़ पढ़ी है।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
मुआज़ा अदविय्या कहती हैं कि मैंने आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) से पूछा: क्या अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हर महीने तीन रोज़े रखा करते थे? उन्होंने उत्तर दिया: हाँ। मैंने पूछा: आप महीने के किस भाग में रोज़ा रखते थे? उन्होंने उत्तर दिया: आपको इसकी परवाह नहीं थी कि महीने के किस भाग में रोज़े रखे जाएँ।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
मुआविया -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को यह फरमाते हुए सुना है : "क़यामत के दिन अज़ान देने वालों की गर्दनें सबसे ऊँची होंगी।"इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अनहुमा) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आशूरा के दिन (मुहर्रम की दसवीं तारीख़ को) रोज़ा रखा और उस दिन रोज़ा रखने का आदेश भी दिया।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
शुरैह बिन हानी कहते हैं कि मैं आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) के पास, उनसे मोज़ों पर मसह करने की अवधि पूछने के लिए आया, तो उन्होंने बताया: तुम अली बिन अबू तालिब (रज़ियल्लाहु अनहु) के पास जाओ और उनसे पूछो; क्योंकि वह अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ सफ़र किया करते थे। हमने उनसे पूछा, तो बताया: अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने यात्री के लिए तीन दिन तीन रात और ठहरे हुए व्यक्ति के लिए एक दिन एक रात की अवधि निर्धारित की है।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) से वर्णित है कि उन्होंने कहा: क्या मैं तुम्हें अपनी और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की एक घटना न सुनाऊँ? हमने कहा: अवश्य सुनाएँ! वर्णनकर्ता का कहना है कि वह कहने लगीं: एक दिन मेरी बारी में अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मेरे पास थे। इसी बीच आपने करवट बदली, अपनी चादर तथा जूतों को उतारकर अपने पैरों के पास रख लिए और अपनी लुंगी के किनारे को बिस्तर पर बिछाकर लेट गए। बस इतनी देर गुज़रने के बाद कि आपको लगा कि मैं सो चुकी हूँ, आपने धीरे से अपनी चादर ली, धीरे से जूता पहना, द्वार खोलकर निकले और धीरे से बंद कर दिया। यह देख मैंने अपनी चादर को सर पर डाल लिया, तहबंद पहन लिया और आपके पीछे- पीछे चल पड़ी। आप बक़ी क़ब्रिस्तान आकर खड़े हो गए और देर तक खड़े रहे। फिर तीन बार अपने हाथों को उठाया (तथा दुआ की) और वापस चल दिए। मैं भी लौट पड़ी। आप तेज़ चलने लगे, तो मैं भी तेज़ चलने लगी। आप दौड़ने लगे, तो मैं भी दौड़ने लगी। इस तरह आप घर पहुँचे, तो मैं भी पहुँच गई। परन्तु, मैं आपसे पहले पहुँची और घर के अंदर प्रवेश कर गई। अभी मैं लेट ही पाई थी कि आप भी आ गए। आपने फ़रमाया: ऐ आइशा! बात क्या है, तुम्हारी साँस क्यों फूल रही है? वर्णनकर्ता का कहना है कि उन्होंने कहा: कुछ नहीं है। आपने फ़रमाया: तुम मुझे बताओगी या मुझे सूक्ष्मदर्शी तथा सबकी ख़बर रखने वाला अल्लाह बताएगा? वह कहती हैं कि मैंने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल! आप पर मेरे माँ- बाप क़ुर्बान हों! फिर मैंने सब कुछ कह सुनाया। आपने फ़रमाया: तो तुम ही वह परछाँई हो, जिसे मैं अपने आगे देख रहा था? मैंने कहा: हाँ। इसपर आपने मेरे सीने पे ऐसा घूँसा जमाया कि मुझे दर्द का अनुभव हुआ। फिर फ़रमाया: क्या तुमको लगता है कि अल्लाह और उसका रसूल तुम्हारा हक़ मार लेंगे? उन्होंने कहा: लोग चाहे जितना छुपाएँ, अल्लाह तो जान ही लेता है। आपने कहाः सच कहती हो। दरअसल, जिबरील (अलैहिस्सलाम) मेरे पास आए थे, जब तुमने मुझे जाते देखा। उन्होंने मुझे तुमसे छिपाते हुए पुकारा और मैंने तुमसे छुपाते हुए उत्तर दिया। वैसे, वह तुम्हारे पास उस समय नहीं आते, जब तुम कपड़े उतार देती हो। मैंने समझा कि तुम सो चुकी हो, इसलिए मैंने तुम्हें जगाना मुनासिब न जाना। मुझे इस बात का भी भय था कि तुम्हें अकेले में डर महसूस होगा। फिर जिबरील ने कहा: आपका रब आपको आदेश देता है कि बक़ी वालों के पास जाएँ और उनके लिए क्षमा याचना करें। आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) का कहना है कि मैंने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल! मैं उनके लिए किन शब्दों में दुआ करूँ? आपने फ़रमाया, कहो: السلام على أهل الديار من المؤمنين والمسلمين، ويرحم الله المستقدمين منا والمستأخرين، وإنا إن شاء الله بكم للاحقون अर्थात, इस स्थान में निवास करने वाले मोमिनों और मुसलमानों पर सलामती हो, अल्लाह हममें से पहले जाने वालों और बाद में आने वालों पर दया करे, अल्लाह ने चाहा तो हम भी तुमसे आ मिलने वाले हैं।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: जुमे के दिन फ़रिश्ते मस्जिद के द्वार पर खड़े हो जाते हैं और सिलसिलेवार मस्जिद में आने वालों के नाम लिखते जाते हैं। सबसे पहले मस्जिद में प्रवेश करने वाले की मिसाल उस व्यक्ति की तरह है, जिसने ऊँट की क़ुर्बानी दी हो, फिर उसकी तरह जिसने गाय की क़ुर्बानी दी हो, फिर मेंढे की, फिर मुर्गी की और फिर अंडे की। जब इमाम प्रवचन के लिए निकल आता है, तो वे अपने रजिस्टर समेट लेते हैं और प्रवचन सुनने लगते हैं।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: मदीने की गुज़रगाहों पर फरिश्ते नियुक्त हैं, यहाँ न ताऊन प्रवेश कर सकता है, न दज्जाल।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू मूसा (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: मेरी उम्मत की मौत नेज़े के आघात तथा ताऊन से होगी। किसी ने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल! नेज़े का आघात तो हम समझ गए, लेकिन यह ताऊन क्या है? आपने फ़रमाया: जिन्नों में से तुम्हारे दुश्मनों का प्रहार। वैसे दोनों से मरने वाले शहीद हैं।इसे अह़मद ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु् अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: जब आदम की संतान सजदे वाली आयत पढ़ती है और सजदा करती है, तो शैतान रोता हुआ दूर हट जाता है। वह कहता है: हाय मेरी बरबादी! आदम की संतान को सजदे का आदेश दिया गया और उसने सजदा किया, तो उसके लिए जन्नत है, जबकि मुझे सजदे का आदेश दिया गया, तो मैंने इनकार कर दिया, अतः मेरे लिए जहन्नम है।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: जिसने सूरज निकलने से पहले सुबह की एक रकात पाई, उसने सुबह की नमाज़ पा ली और जिसने सूरब डूबने से पहले अस्र की एक रकात पाई, उसने अस्र की नमाज़ पा ली।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
उक़बा बिन आमिर जुहनी -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है, वह कहते हैं : तीन समय ऐसे हैं, जिनमें अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हमें नमाज़ पढ़ने अथवा अपने मुर्दों को दफ़नाने से मना करते थे : जब सूरज स्पष्ट रूप से निकल रहा हो, यहाँ तक कि ऊँचा हो जाए, जब सूरज बीच आसमान में हो, यहाँ तक कि ढल जाए और जब सूरज डूबने लगे, यहाँ तक कि डूब जाए।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
जुबैर बिन मुतइम (रज़ियल्लाहु अनहु) से मरफ़ूअन वर्णित है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: किसी को रात या दिन के जिस भाग में चाहे, इस घर का तवाफ़ (परिक्रमा) करने या इसमें नमाज़ पढ़ने से न रोको।इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है। - इसे दारिमी ने रिवायत किया है।
जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : ''जिसने अज़ान सुनते समय यह दुआ पढ़ी : "ऐ अल्लाह! इस संपूर्ण आह्वान तथा खड़ी होने वाली नमाज़ के रब! मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को वसीला (जन्नत का सबसे ऊँचा स्थान) और श्रेष्ठतम दर्जा प्रदान कर और उन्हें वह प्रशंसनीय स्थान प्रदान कर, जिसका तूने उन्हें वचन दिया है।" उसके लिए क़यामत के दिन मेरी सिफ़ारिश अनिवार्य हो जाएगी।''इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है
अबू मरसद ग़नवी रज़ियल्लाहु अनहु बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “क़ब्रों पर मत बैठो और उनकी ओर मुँह करके नमाज़ न पढ़ो।”इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
अब्दुल्लाह बिन शिख़्ख़ीर (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को नमाज़ पढ़ते समय देखा कि आपके सीने से रोने के कारण चक्की के चलने की तरह आवाज़ निकल रही है। आपपर अल्लाह की कृपा हो और शांति की धारा बरसे।इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।
अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "जब खाना सामने रख दिया जाए, तो मग़रिब की नमाज़ से पहले खाना खा लो और खाना छोड़कर नमाज़ के लिए जाने की जल्दी न करो।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने एक बार (मस्जिद के अंदर) क़िबले की ओर थूक देखा, तो यह आपको बहुत बुरा लगा और इसका प्रभाव आपके चेहरे पर देखा गया। चुनांचे आप खड़े हुए और उसे अपने हाथ से साफ़ किया तथा फ़रमाया : "तुममें से कोई जब नमाज़ में खड़ा होता है, तो वह अपने रब से व्यक्तिगत रूप से बात कर रहा होता है या उसका रब उसके और क़िबले के बीच होता है। इसलिए, तुममें से कोई (नमाज़ की हालत में) क़िबले की ओर न थूके। बल्कि बाएँ तरफ़ या अपने क़दमों के नीचे थूके।" फिर आपने अपनी चादर के एक किनारे को पकड़कर उसमें थूका और उसे आपस में रगड़ दिया और कहा : "या फिर इस तरह करे।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "कुछ लोगों को क्या हो गया है कि वे नमाज़ में अपनी नज़रें आकाश की ओर उठाते हैं?" आपने इसके बारे में बड़ी सख़्त बात करते हुए यहाँ तक फ़रमा दिया : "वे इससे ज़रूर रुक जाएँ, वरना उनकी आँखें उचक ली जाएँगी।"इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है
मुसलमानों की माता आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है कि उम्म-ए-सलमा रज़ियल्लाहु अनहा ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास हबशा (इथियोपिया) में देखे हुए मारिया नामी एक गिरजाघर और उसके चित्रों का वर्णन किया, तो आपने कहा : "वे ऐसे लोग हैं कि उन लोगों के अंदर जब कोई सदाचारी बंदा अथवा सदाचारी व्यक्ति मर जाता, तो उसकी कब्र के ऊपर मस्जिद बना लेते और उसमें वो चित्र बना देते। वे अल्लाह के निकट सबसे बुरे लोग हैं।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
इब्ने अब्बास -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल - सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने पर्दा हटाया तो देखा कि लोग अबू बकर के पीछे पंक्ति में खड़े हैं, तो आप ने फरमायाः( ऐ लोगों, नबूवत के शुभ संदेशों में से अब केवल अच्छे स्वप्न ही रह गए हैं, जिस को मुस्लिम देखता है, या उस के लिए देखा जाता है, सचेत रहो! मुझे रुकू तथा सज्दा में क़ुरआन पढ़ने से मना किया गया है। जहां तक रूकू की बात है तो उस में अपने रब की महानता का बखान करो, रही बात सज्दे की तो उस मके साथ दुआ करो, क्योंकि उस समय की गई दुआ के स्वीकार होने की प्रबल संभावना रहती है।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
ह़कम से वर्णित है, वह कहते हैं कि कूफा पर इब्ने अशअस़ के समय में एक व्यक्ति का प्रभुत्व हो गया था -जिस का नाम उन्होंने बताया था-, तो इब्ने अशअस़ ने अबू उबैदा बिन अब्दुल्लाह को लोगों को नमाज़ पढ़ाने का आदेश दिया, अतः वह लोगों को नमाज़ पढ़ाया करते थे, जब वह रुकू से सिर उठाते तो उतने समय तक खड़े रहते जितने समय में मैं (اللَّهُم ربَّنا لك الحَمد، مِلْءَ السَّماوات ومِلْءَ الأرض، ومِلْءَ ما شِئت من شَيء بعد، أهْل الثَّناء والمَجد، لا مانع لما أعْطَيت، ولا مُعْطِي لما مَنعت، ولا يَنفع ذَا الجَدِّ مِنْك الجَدِّ) ऐ अल्लाह, तेरे लिए आकाश भर और पृथ्वी भर तथा उस के सिवा भी जो तू चाहे उतनी, समस्त प्रकार की प्रशंसा है, तू प्रशंसा तथा महानता के योग्य है, जिस को तू दे दे उसे कोई रोकने वाला नहीं, और जिस से तू रोक दे उसे कोई देने वाला नहीं, तेरे यहां किसी का वैभव कुछ भी काम नहीं आएगा। ह़कम कहते हैंः मैंने इसका उल्लेख अब्दुर्रहमान बिन अबू लैला से किया, तो उन्होंने कहा किः मैंने बरा बिन आज़िब- रज़ियल्लाहु अन्हु- को फरमाते हुए सुना हैः नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की नमाज़, और आप का रुकू, तथा जब आप रुकू से सिर उठाते (उस के बाद का समय), और आप के सज्दे तथा दो सज्दों के मध्य बैठने का समय, सभी लग-भग बराबर होते। शोअबा कहते हैं कि मैंने इस का उल्लेख अम्र बिन मु्र्रा से किया तो उन्होंने फरमायाः मैंने इब्ने अबू लैला को देखा है, उन की नमाज़ इस प्रकार की नहीं थी।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "मुझे ‏शरीर के सात अंगों पर सजदा करने का हुक्म दिया गया है: पेशानी पर और आपने अपने हाथ से अपनी नाक की ओर इशारा किया, दोनों हाथों और दोनों घुटनों तथा दोनों पावों की उंग्लियों पर और यह भी हुक्म दिया गया कि हम कपड़ों और बालों को न समेटें।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है