Hadith for the World
फ़ज़ीलतें तथा आदाब

दुआओं तथा अज़कार पर आधारित फ़िक़्ह

62 hadiths

62 hadiths

आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) कहती हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब तेज़ हवाएँ चलतीं तो यह दुआ पढ़ा करते थे: «اللَّهُمَّ إنِّي أسْأَلُك خَيرها وخير ما فيها وخَير ما أُرسِلت به، وأعوذ بك من شرِّها وشرِّ ما فيها وشرِّ ما أُرسِلت به» अर्थात, “ऐ अल्लाह ! मैं तुझसे इसकी भलाई तथा जो भलाई इसमें रखी गई है और जिस भलाई के साथ यह भेजी गई है, का सवाल करता हूँ और तेरी शरण माँगता हूँ, इसकी बुराई से तथा उस बुराई से जो इसमें में रखी गई है और उस बुराई से जिस के साथ यह भेजी गई है।”इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अनस (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) साद बिन उबादा (रज़ियल्लाहु अनहु) के यहाँ पहुँचे, तो उन्होंने रोटी और तेल पेश किया। आपने उसे खाया और यह दुआ फ़रमाई : "أفْطَرَ عِنْدَكُمُ الصَّائِمُونَ؛ وَأكَلَ طَعَامَكُمُ الأَبرَارُ، وَصَلَّتْ عَلَيْكُمُ المَلاَئِكَةُ" (तुम्हारे यहाँ रोज़ेदार इफ़तार किया करें, तुम्हारा खाना नेक लोग खाएँ और फ़रिश्ते तुम्हारे लिए दुआ करें)।इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है। - इसे दारिमी ने रिवायत किया है।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अनहुमा) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) यह दुआ किया करते थेः «ربِّ أَعِنِّي ولا تُعِن عليَّ، وانصرني ولا تنصر عليَّ، وامكر لي ولا تمكر عليَّ، واهدني ويسِّر هُدايَ إليَّ، وانصرني على مَن بغى عليَّ، اللهم اجعلني لك شاكرًا، لك ذاكرًا، لك راهبًا، لك مِطواعًا، إليك مُخْبِتًا، أو مُنِيبا، رب تقبَّل توبتي، واغسل حَوْبتي، وأجب دعوتي، وثبِّت حُجَّتي، واهدِ قلبي، وسدِّد لساني، واسْلُلْ سَخِيمةَ قلبي». अर्थात, ऐ मेरे रब! मेरी सहायता कर और मेरे विरुद्ध सहायता न कर, मुझे विजय प्रदान कर और किसी को मेरे विरुद्ध विजय प्रदान न कर, मेरे हक़ में योजना बना तथा मेरे विरुद्ध योजना मत बना, मुझे सच्चाई के रास्ते पर चला और सच्चाई के रास्ते पर चलना मेरे लिए आसान कर तथा मेरे विरुद्ध विपलव करने वाले पर मुझे विजयी बना। ऐ अल्लाह! मुझे अपना शुक्र अदा करने वाला, अपना ज़िक्र करने वाला, अपने से डरने वाला, अपना अनुकरण करने वाला और अपने आगे झुकने वाला या अपनी ओर लौटने वाला बना। ऐ मेरे रब! मेरी तौबा क़बूल कर, मेरे गुनाह धो दे, मेरी दुआ क़बूल कर, मेरी दलील को सिद्ध कर, मेरे दिल को सच्चा रास्ता दिखा, मेरी ज़बान को दुरुस्त रख और मेरे दिल के मैल- कुचैल को निकाल दे।इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।
ज़ैद बिन अरक़म (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: इन शौच के स्थानों में शैतान तथा जिन्न उपस्थित रहते हैं। अतः, जब तुममें से कोई शौच के स्थान में आए, तो यह दुआ पढ़े: أعوذُ باللهِ مِنَ الخُبُثِ والخَبَائث अर्थात, मैं नापाक जिन्नों और नापाक जिन्नियों (की बुराइयों से) से अल्लाह की शरण में आता हूँ।इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।
अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के मुक्त किए हुए दास ज़ैद (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: जिसने कहा: أستغفر الله الذي لا إله إلا هو الحي القيوم وأتوب إليه अर्थात,'मैं अल्लाह से क्षमा माँगता हूँ, जिसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह जीवित है, सारी कायनात को संभालने वाला है और मैं उसी की ओर लौटता हूँ', उसके गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं, यद्यपि वह युद्ध के मैदान से भागा हो।इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।
अबू मालिक अशअरी रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "पवित्रता आधा ईमान है, अल-हम्दु लिल्लाह तराज़ू को भर देता है, सुबहानल्लाह और अल-हम्दु लिल्लाह दोनों मिलकर आकाश एवं धरती के बीच के खाली स्थान को भर देते हैं, नमाज़ नूर है, सदक़ा प्रमाण है, धैर्य प्रकाश है और क़ुरआन तुम्हारे लिए या तुम्हारे विरुद्ध प्रमाण है। प्रत्येक व्यक्ति जब रोज़ी की खोज में सुबह निकलता है, तो अपने नफ़्स को बेचता है। चुनांचे वह उसे आज़ाद करता है या उसका विनाश करता है।"इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू हुमैद या अबू उसैद से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जब तुममें से कोई मस्जिद में प्रवेश करे, तो यह दुआ पढ़े : "اللَّهُمَّ افْتَحْ لِي أَبْوَابَ رَحْمَتِكَ" (ऐ अल्लाह! मेरे लिए अपनी रहमत के द्वार खोल दे) और जब मस्जिद से निकले, तो यह दुआ पढ़े : "اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ مِنْ فَضْلِكَ" (ऐ अल्लाह! मैं तुझसे तेरा अनुग्रह माँगता हूँ।)इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
उसमान बिन अबुल आस रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं : वह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आए और कहने लगे : ऐ अल्लाह के रसूल! शैतान मेरे, मेरी नमाज़ तथा मेरी तिलावत के बीच रुकावट बनकर खड़ा हो जाता है। मुझे उलझाने के प्रयास करता है। यह सुन अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "यह एक शैतान है, जिसे ख़िंज़िब कहा जाता है। जब तुम्हें उसके व्यवधान डालने का आभास हो, तो उससे अल्लाह की शरण माँगो और तीन बार अपने बाएँ ओर थुत्कारो।" उनका कहना है कि मैंने इसपर अमल करना शुरू किया, तो अल्लाह ने मेरी इस परेशानी को दूर कर दिया।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
عن أبي بكر الصديق رضي الله عنه: أنه قال لرسول الله صلى الله عليه وسلم: علمني دعاء أدعو به في صلاتي، قال: "قل: اللهم إني ظلمت نفسي ظلما كثيرا، ولا يغفر الذنوب إلا أنت، فاغفر لي مغفرة من عندك، وارحمني إنك أنت الغفور الرحيم".متفق عليه
عن ابن عمر قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أفطر قال: "ذهب الظمأُ، وابتلت العروق، وثبت الأجر إن شاء الله".رواه أبو داود
عَنْ أَبِي مَالِكٍ الْأَشْجَعِيُّ عَنْ أَبِيهِ قَالَ: كَانَ الرَّجُلُ إِذَا أَسْلَمَ عَلَّمَهُ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الصَّلَاةَ، ثُمَّ أَمَرَهُ أَنْ يَدْعُوَ بِهَؤُلَاءِ الْكَلِمَاتِ: «اللهُمَّ اغْفِرْ لِي وَارْحَمْنِي وَاهْدِنِي وَعَافِنِي وَارْزُقْنِي». وَفِي رِوَايَةٍ: أَنَّهُ سَمِعَ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَأَتَاهُ رَجُلٌ، فَقَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ كَيْفَ أَقُولُ حِينَ أَسْأَلُ رَبِّي؟ قَالَ: «قُلْ: اللهُمَّ اغْفِرْ لِي وَارْحَمْنِي وَعَافِنِي وَارْزُقْنِي» وَيَجْمَعُ أَصَابِعَهُ إِلَّا الْإِبْهَامَ «فَإِنَّ هَؤُلَاءِ تَجْمَعُ لَكَ دُنْيَاكَ وَآخِرَتَكَ».رواه مسلم
عَنْ حُذَيْفَةَ قَالَ: كَانَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ إِذَا أَرَادَ أَنْ يَنَامَ قَالَ: «بِاسْمِكَ اللَّهُمَّ أَمُوتُ وَأَحْيَا» وَإِذَا اسْتَيْقَظَ مِنْ مَنَامِهِ قَالَ: «الحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَحْيَانَا بَعْدَمَا أَمَاتَنَا، وَإِلَيْهِ النُّشُورُ».رواه البخاري
عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ: قَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «لاَ يَتَمَنَّيَنَّ أَحَدُكُمُ المَوْتَ مِنْ ضُرٍّ أَصَابَهُ، فَإِنْ كَانَ لاَ بُدَّ فَاعِلًا، فَلْيَقُلْ: اللَّهُمَّ أَحْيِنِي مَا كَانَتِ الحَيَاةُ خَيْرًا لِي، وَتَوَفَّنِي إِذَا كَانَتِ الوَفَاةُ خَيْرًا لِي».متفق عليه
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "सात प्रकार के लोग ऐसे हैं, जिनको अल्लाह उस दिन अपने अर्श के नीचे छाया देगा, जिस दिन उसकी छाया के अतिरिक्त कोई छाया नहीं होगी : न्यायकारी शासनकर्ता, अल्लाह की इबादत में पलने वाला जवान, ऐसा व्यक्ति जिसका दिल मस्जिद में अटका हुआ हो, दो ऐसे व्यक्ति जो एक-दूसरे से अल्लाह के लिए प्रेम रखते हों, इसी को सामने रखते हुए मिलते हों और इसी को सामने रखते हुए जुदा होते हों, एक व्यक्ति जिसे कोई प्रतिष्ठित एवं सुंदर महिला बुलाए और वह कह दे कि मैं अल्लाह से डरता हूँ, एक वह व्यक्ति जो इस तरह छुपाकर सदक़ा करे कि उसके बाएँ हाथ को ख़बर न हो कि दाएँ हाथ ने क्या खर्च किया है और एक वह व्यक्ति जो अल्लाह को एकांत में याद करे और उसकी आँखें भर आएँ।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है