Hadith for the World
दुआओं तथा अज़कार पर आधारित फ़िक़्ह

साधारण अज़कार

5 hadiths

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जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है, वह कहते हैं कि मैं ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह फरमाते हुए सुना : "सबसे उत्तम ज़िक्र 'ला इलाहा इल्लल्लाह' और सबसे उत्तम दुआ 'अल-हम्दु लिल्लाह' है।"इसे तिर्मिज़ी ने तथा नसई ने अल-सुनन अल-कुबरा में एवं इब्न-ए-माजह ने रिवायत किया है
अबू सईद ख़ुदरी (रज़ियल्लाहु अन्हु) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः “शेष रहने वाली नेक चीज़ें हैंः ला इलाहा इल्लल्लाह (अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है), सुबहान अल्लाह (अल्लाह पाक है), अल्लाहु अकबर (अल्लाह सबसे बड़ा है) अल-हम्दुलिल्लाह (समस्त प्रकार की प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है) तथा ला ह़ौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह (अल्लाह की मदद बिना न हालात बदलने की ताक़त है और न कुछ करने का साहस)।”इसे इब्ने ह़िब्बान ने रिवायत किया है । - इसे ह़ाकिम ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : दो शब्द रहमान (अल्लाह) को बड़े प्रिय हैं, ज़ुबान पर बड़े हलके हैं और तराज़ू में बड़े भारी होंगे : सुबहानल्लाहिल अज़ीम, सुबहानल्लाहि व बिहम्दिहि (अल्लाह पाक है अपनी प्रशंसा समेत, पाक है अल्लाह जो बड़ा महान है)।”इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है, उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "सुबहानल्लाह, अल-हम्दु लिल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाह और अल्लाहु अकबर कहना, मेरे निकट उन सारी चाज़ों की तुलना में अधिक उत्तम है, जिनपर सूरज निकलता है।"इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
عَنْ أَبِي مَالِكٍ الْأَشْجَعِيُّ عَنْ أَبِيهِ قَالَ: كَانَ الرَّجُلُ إِذَا أَسْلَمَ عَلَّمَهُ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الصَّلَاةَ، ثُمَّ أَمَرَهُ أَنْ يَدْعُوَ بِهَؤُلَاءِ الْكَلِمَاتِ: «اللهُمَّ اغْفِرْ لِي وَارْحَمْنِي وَاهْدِنِي وَعَافِنِي وَارْزُقْنِي». وَفِي رِوَايَةٍ: أَنَّهُ سَمِعَ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَأَتَاهُ رَجُلٌ، فَقَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ كَيْفَ أَقُولُ حِينَ أَسْأَلُ رَبِّي؟ قَالَ: «قُلْ: اللهُمَّ اغْفِرْ لِي وَارْحَمْنِي وَعَافِنِي وَارْزُقْنِي» وَيَجْمَعُ أَصَابِعَهُ إِلَّا الْإِبْهَامَ «فَإِنَّ هَؤُلَاءِ تَجْمَعُ لَكَ دُنْيَاكَ وَآخِرَتَكَ».رواه مسلم