HI
फ़ज़ीलतें तथा आदाब
दुआओं तथा अज़कार पर आधारित फ़िक़्ह
62 hadiths
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ज़िक्र का तरीक़ा
5
सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के ज़िक्र के लाभ
8
सुबह तथा शाम के अज़कार
4
साधारण अज़कार
5
घर में प्रवेश करने और घर से निकलने के अज़कार
2
शौचालय में प्रवेश करने और उससे बाहर निकलने के अज़कार
1
मस्जिद में प्रवेश करने और उससे बाहर निकलने के अज़कार
2
कठिन परिस्थितियों में कहने के अज़कार
1
मुसीबत के समय के अज़कार
12
दुआ के अहकाम
1
दुआ के आदाब
2
दुआ ग्रहण होने में सहायक चीज़ें तथा उसे ग्रहण न होने देने वाली वस्तुएँ
4
मासूर दुआएँ
18
62 hadiths
अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) शाम के समय यह दुआ पढ़तेः "أمسينا وأمسى الملك لله، والحمد لله، لا إله إلا الله وحده لا شريك له" (अर्थात्ः हमने शाम की और अल्लाह के आदेश से देश ने शाम की। सारी प्रशंसा अल्लाह की है। अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं है। वह अकेला है। उसका कोई साझी नहीं है।) वर्णनकर्ता कहते हैंः मुझे लगता है कि आप उक्त शब्दों के साथ यह भी कहा करते थेः "له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير، ربِّ أسألك خير ما في هذه الليلة وخير ما بعدها، وأعوذ بك من شر ما في هذه الليلة وشر ما بعدها، رب أعوذ بك من الكسل، وسُوءِ الكِبَرِ، رب أعوذ بك من عذاب في النار، وعذاب في القبر" (अर्थात्ः उसी का राज्य है, उसी की प्रशंसा है एवं वह हर चीज़ की शक्ति रखता है। मेरे प्रभु! मैं तुझसे इस रात में जो कुछ है तथा इसके बाद जो कुछ है, उसकी भलाई माँगता हूँ, तथा इस रात में जो कुछ है एवं इसके बाद जो कुछ है, उसकी बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ। मेरे प्रभु! मैं सुस्ती एवं अभिमान की बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ। मेरे प्रभु! मैं जहन्नम और क़ब्र की यातना से तेरी शरण माँगता हूँ।) तथा जब सुब्ह करते, तो कहतेः "أصبحنا وأصبح الملك لله" (अर्थात्ः हमने सुब्ह की और अल्लाह के लिए देश ने भी सुब्ह की।)
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है कि उन्होंने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "जब आदमी अपने घर में प्रवेश करता है और प्रवेश करते समय एवं खाना खाते समय अल्लाह का नाम लेता है, तो शैतान अपने साथियों से कहता है : यहाँ न तुम्हारे लिए रात बिताने का स्थान है और न रात के खाने का प्रबंध। और जब वह घर में प्रवेश करता है तथा प्रवेश करते समय अल्लाह का नाम नहीं लेता, तो शैतान कहता है : तुमने रात बिताने का स्थान पा लिया और जब खाना खाते समय अल्लाह का नाम नहीं लेता, तो कहता है : तुमने रात बिताने की जगह तथा रात का खाना दोनों पा लिया।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : “ऐ अल्लाह! मैंने अपने आपको तेरे सामने समर्पित कर दिया, तुझपर ईमान लाया, तुझपर भरोसा किया, तेरी ओर लौटा और तेरी मदद से दुश्मनों से झगड़ा किया। ऐ अल्लाह! मैं तेरे प्रभुत्व की शरण में आता हूँ कि तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, इस बात से कि तू मुझे गुमराह करे। तू जीवंत है, जिसे कभी मौत नहीं आती, जबकि जिन्न और इन्सान मरते हैं।”
बुख़ारी एवं मुस्लिम ने इसे रिवायत किया है, तथा उपरोक्त शब्द मुस्लिम द्वारा वर्णित हैं और बुख़ारी ने इसे संक्षेप में रिवायत किया है
अबू मूसा अशअरी- रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैंः अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के समय में सूर्य ग्रहण हुआ, तो आप घबरा उठे, डर रहे थे कि कहीं क़यामत न आ जाए, यहाँ तक कि मस्जिद आए और सब से लंबे क़याम तथा सजदे के साथ नमाज़ पढ़ाई। मैंने आपको इतनी लंबी नमाज़ पढ़ाते कभी नहीं देखा था। फिर फ़रमायाः "निश्चय यह निशानियाँ, जिन्हें अल्लाह भेजता है, किसी के मरने या जीने से सामने नहीं आतीं। बल्कि उन्हें वह अपने बंदों को डराने के लिए भेजता है। अतः जब उनमें से कोई चीज़ देखो, तो अल्लाह के ज़िक्र, दुआ और क्षमा याचना की ओर भागो।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
जाबिर बिन अब्दुल्लाह- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से रिवायत है कि नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमायाः "तुम अपने लिए बददुआ न करो, अपनी संतान के लिए बहदुआ न करो तथा अपनी धन-दौलत के लिए दुष्कामना न करो। कहीं ऐसा न हो कि तुम अल्लाह की ओर से उस घड़ी को पा लो, जिसमें उससे कुछ माँगा जाए, तो वह तुम्हारी दुआ क़बूल कर ले।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा (रजि़यल्लाहु अन्हु) का वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः तुममें से किसी की दुआ उस समय तक क़बूल होती है, जब तक वह जल्दबाजी न करे, अर्थात ऐसा न कहे कि मैंने अपने रब को पुकारा, परन्तु, मेरी दुआ क़बूल ना हुई। तथा मुस्लिम की रिवायत में हैः "बंदे की दुआ उस समय तक क़बूल होती है, जब तक गुनाह या रिश्ता-नाता तोड़ने की दुआ न करे, जब तक जल्दबाजी न करे।" प्रशन किया गया कि ऐ अल्लाह के रसूल, जल्दबाजी करने का क्या अर्थ है? आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः "ऐसा कहे कि मैंने दुआ की, फिर दुआ की, परन्तु मेरी दुआ क़बूल नहीं हुई और इसके बाद थक हार कर बैठ जाए और दुआ करना छोड़ दे।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू उमामा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि मुझे अम्र बिन अबसा रज़ियल्लाहु अनहु ने बताया है कि उन्होंने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "अल्लाह अपने बंदे से सबसे निकट रात के अंतिम भाग में होता है। अतः यदि उस समय अल्लाह का स्मरण करने वालों में शामिल हो सको, तो हो जाओ।"
इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी और नसई ने रिवायत किया है
अनस बिन मालिक- रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः जिसने (घर से निकलते समय) कहाः 'بِسم الله تَوَكَّلتُ على اللهِ، وَلاَ حول ولا قُوَّة إِلَّا بالله' (अर्थात, अल्लाह के नाम से, मैंने अल्लाह पर भरोसा किया तथा अल्लाह के सिवा कोई शक्ति और कोई ताक़त नहीं है।) उससे कहा जाता हैः तुझे मार्ग दिखा दिया गया, तुझे राहत दे दी गई तथा तुझे सुरक्षित कर दिया गया और शैतान उससे दूर हट जाता है। अबू दाऊद में इतना अधिक है कि तो एक शैतान दूसरे शैतान से कहता हैः भला, तुम उस आदमी पर डोरे कैसे डाल सकोगे, जिसे मार्ग दिखा दिया गाय, राहत दे दी गई और सुरक्षा प्रदान कर दी गई?
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।
जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है, वह कहते हैं कि मैं ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह फरमाते हुए सुना : "सबसे उत्तम ज़िक्र 'ला इलाहा इल्लल्लाह' और सबसे उत्तम दुआ 'अल-हम्दु लिल्लाह' है।"
इसे तिर्मिज़ी ने तथा नसई ने अल-सुनन अल-कुबरा में एवं इब्न-ए-माजह ने रिवायत किया है
सुलैमान बिन सुरद रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं : मैं अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ बैठा हुआ था और (निकट ही) दो व्यक्ति एक-दूसरे को गाली गलौज कर रहे थे। उनमें एक व्यक्ति का चेहरा ग़ुस्से के कारण लाल हो गया था और उसकी रगें फूल गई थीं। यह देख अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "मुझे एक ऐसा वाक्य मालूम है कि अगर यह व्यक्ति उसे पढ़ ले, तो इसका ग़ुस्सा ठंडा हो जाए। अगर इसने कहा : मैं शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूँ। तो इसका ग़ुस्सा ठंडा हो जाएगा।" अतः लोगों ने उससे कहा कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "शैतान से अल्लाह की शरण माँग।" तो उसने उत्तर दिया : क्या मैं पागल हूँ?
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अब्दुल्लाह बिन मसऊद -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- फ़रमाया करते थे : "ऐ अल्लाह! मैं तुझसे मार्गदर्शन, धर्मनिष्ठा, पवित्राचार और बेनियाज़ी (निस्पृहता) माँगता हूँ।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
जाबिर- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को फ़रमाते हुए सुनाः "रात में एक समय होता है कि जो मुसलमान उसमें अल्लाह से दुनिया एवं आख़िरत से संबंधित कोई भलाई माँगता हुआ पाया जाएगा, अल्लाह उसे ज़रूर प्रदान करेगा। यह घड़ी हर रात आती है।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "उच्च एवं महान अल्लाह कहता है : मैं अपने बारे में अपने बंदे की सोच के निकट होता हूँ तथा मैं उसके साथ होता हूँ, वह जब भी मुझे याद करे। अगर वह अपने मन में मुझे याद करता है, तो मैं भी उसे अपने मन में याद करता हूँ। अगर वह किसी सभा में मेरा ज़िक्र करता है, तो मैं उसका ज़िक्र ऐसी सभा में करता हूँ, जो उसकी सभा से बेहतर होती है। अगर वह मेरी ओर एक बित्ता आता है, मैं उसकी ओर एक हाथ जाता हूँ, और अगर मेरी ओर एक हाथ आता है, मैं उसकी ओर दो हाथ जाता हूँ तथा अगर मेरी ओर चलकर आता है, मैं उसकी ओर दौड़कर जाता हूँ।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
साद बिन अबू वक़्क़ास- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि हम अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास थे कि आपने फ़रमायाः क्या तुममें से कोई इस बात से विवश है कि प्रत्येक दिन एक हज़ार नेकियाँ प्राप्त करे? आपके पास बैठे लोगों में से एक व्यक्ति ने पूछाः आदमी एक हज़ार नेकियाँ कैसे प्राप्त कर सकता है? आपने फ़रमायाः सौ बार 'सुबहानल्लाह' कहने से उसके लिए एक हज़ार नेकियाँ लिखी जाएँगी अथवा उसके एक हज़ार गुनाह मिटाए जाएँगे।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
तथा अबू मूसा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "उस व्यक्ति की मिसाल जो अपने रब को याद करता है और उसकी मिसाल जो अपने रब को याद नहीं करता, जीवित और मृत की सी है।" सही मुस्लिम के शब्द हैं : "उस घर की मिसाल जिसमें अल्लाह को याद किया जाता है और उस घर की मिसाल जिसमें अल्लाह को याद नहीं किया जाता, जीवित और मृत जैसी है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को कहते हुए सुनाः अल्लाह की क़सम! मैं दिन में सत्तर बार से अधिक अल्लाह से क्षमा माँगता हूँ और उसके सामने तौबा करता हूँ।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के एक सहाबी अग़र्र -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "ऐ लोगो! अल्लाह के सामने तौबा करो, क्योंकि खुद मैं दिन में सौ बार तौबा करता हूँ।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू उमामा- रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब दस्तरख़्वान उठाते तो कहतेः "الحَمْدُ للهِ حَمْدًا كَثِيرًا طَيِّبًا مُبَارَكًا فِيهِ، غَيْرَ مَكْفِيٍّ، وَلَا مُوَدَّعٍ، وَلَا مُسْتَغْنًى عَنْهُ رَبَّنَا" (अर्थात, सारी प्रशंसाएँ अल्लाह की हैं, बहुत ज़्यादा, स्वच्छ और बरकत वाली प्रशंसा, वह सबके लिए काफ़ी है, उसे छोड़ा नहीं जा सकता, और ना ही कोई तेरी प्रशंसा से निस्पृह हो सकता है)।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अनहुमा- से रिवायत है कि : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- परेशानी के समय यह दुआ पढ़ा करते थे : (अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, जो महान एवं सहिष्णु है। अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, जो महान सिंहासन का रब है। अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, जो आकाशों, धरती एवं सम्मानित सिंहासन का रब है।)
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "बंदा अपने रब से सबसे अधिक निकट उस समय होता है, जब वह सजदे में होता है। अतः तुम उसमें ख़ूब दुआएँ किया करो।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- सजदे की हालत में यह दुआ किया करते थे : “हे अल्लाह, तू मेरे समस्त पापों को क्षमा कर दे; छोटे-बड़े, अगले-पिछले तथा स्पष्ट-अस्पष्ट सभी को।”
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू सईद ख़ुदरी (रज़ियल्लाहु अन्हु) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः “शेष रहने वाली नेक चीज़ें हैंः ला इलाहा इल्लल्लाह (अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है), सुबहान अल्लाह (अल्लाह पाक है), अल्लाहु अकबर (अल्लाह सबसे बड़ा है) अल-हम्दुलिल्लाह (समस्त प्रकार की प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है) तथा ला ह़ौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह (अल्लाह की मदद बिना न हालात बदलने की ताक़त है और न कुछ करने का साहस)।”
इसे इब्ने ह़िब्बान ने रिवायत किया है । - इसे ह़ाकिम ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है।
अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "अज़ान तथा इक़ामत के बीच की जाने वाली दुआ रद्द नहीं होती।"
इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी और नसई ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "ऐ अल्लाह! मेरे लिए मेरे धर्म को सुधार दे, जो मेरे मामले का संरक्षण है और मेरे लिए मेरी दुनिया को सुधार दे, जिसके अंदर मेरी जीविका है, और मेरे लिए मेरी आख़िरत को सुधार दे, जहाँ मुझे लौटना है। तथा मेरे लिए जीवन को प्रत्येक भलाई में वृद्धि का कारण बना दे और मृत्यु को मेरे लिए प्रत्येक बुराई से मोक्ष का कारण बना दे।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
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