Hadith for the World
Topic

फ़िक़्ह तथा उसूल-ए-फ़िक़्ह

288 hadiths

288 hadiths

आइशा- रज़ियल्लाहु अन्हा- कहती हैं कि जब किसी बीमारी आदि के कारण, अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की रात की नमाज़ छूट जाती तो दिन में बारह रकअत पढ़ लेते थे।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
आइशा- रज़ियल्लाहु अन्हा- और मुग़ीरा बिन शोबा- रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) रात में इतनी देर तक नमाज़ में खड़े रहते कि आपके दोनों पाँव सूज जाते थे। मैंने आपसे कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! आप ऐसा क्यों करते हैं, जबकि अल्लाह ने आपके अगले-पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए हैं? तो फ़रमायाः क्या मुझे यह अच्छा नहीं लेगगा कि मैं शुक्रगुज़ार बंदा बनूँ?इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः अल्लाह के निकट सबसे प्रिय स्थान मस्जिदें और सबसे अप्रिय स्थान, बाज़ार हैं।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
मुसलमानों की माता आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- का वर्णन है, वह कहती हैं : जब रमज़ान के अंतिम दस दिन आते, तो अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- रातों को जागते, अपने घर के लोगों को जगाते, ख़ूब इबादतें करते और कमर कस लेते।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा से वर्णित है, उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जिबरील मुझे बराबर पड़ोसी के बारे में ताकीद करते रहे, यहाँ तक कि मुझे लगने लगा कि वह उसे वारिस बना देंगे।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, कि उन्होंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "तुम्हारा क्या विचार है कि यदि तुममें से किसी के द्वार पर नहर प्रवाहित हो और वह उसमें प्रत्येक दिन पाँच बार स्नान करता हो, तो क्या उसके शरीर में मैल का कोई अंश बचेगा?" सहाबा ने कहा : उसके शरीर में मैल का कोई अंश नहीं बचेगा। तो फ़रमाया : "यही उदाहरण है पाँच नमाज़ों का। इनके ज़रिए अल्लाह गुनाहों को मिटा देता है।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) कहती हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के ज़माने में सूरज को ग्रहण लगा, तो अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने लोगों को नमाज़ पढाई। आपने लंबा क़याम किया, फिर रुकू किया और देर तक रुकू में रहे, फिर खड़े हुए और देर तक खड़े रहे, (परन्तु, इस बार पहली बार की तुलना में कुछ कम खड़े रहे) फिर रुकू किया और देर तक रुकू में रहे, (परन्तु पहले रुकू की तुलना में कुछ कम) फिर सर उठाया और देर तक खड़े रहे (लेकिन पहली बार के मुक़ाबले में कुछ कम) फिर सजदा किया और देर तक सजदे में रहे। फिर दूसरी रकात में उसी तरह किया जैसा पहली रकात में किया था। फिर नमाज़ से निकले, तो सूरज पूरे तौर पर खुल चुका था। उसके बाद लोगों के सामने ख़ुतबा दिया और अल्लाह की प्रशंसा एवं स्तुति के बाद फ़रमायाः "सूरज और चाँद अल्लाह की निशानियों में से दो निशानियाँ हैं। उन्हें ग्रहण किसी व्यक्ति की मौत और जीवन के लिए नहीं लगता। अतः, जब तुम ऐसा होता देखो तो अल्लाह से दुआ करो, तकबीर कहो, नमाज़ पढ़ो और सदक़ा करो।" फिर फ़रमाया: ऐ मुहम्मद की उम्मत, अल्लाह की क़सम, अल्लाह से अधिक किसी को इस बात पर ग़ैरत नहीं आती कि उसका दास अथवा उसकी दासी व्यभिचार में लिप्त हो। ऐ मुहम्मद की उम्मत, यदि तुम वह जान लेते, जो मैं जानता हूँ तो तुम कम हँसते और अधिक रोते। तथा एक रिवायत में हैः आपने चार रुकू और चार सजदे किए।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) कहती हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) रात के हर भाग में वित्र पढ़ते थे। शुरू में भी, बीच में भी और अंत में भी। आपके वित्र पढ़ने अंतिम समय सहर तक होता था।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अम्र बिन शोऐब अपने पिता के माध्यम से अपने दादा से वर्णन करते हैं, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "अपने बच्चों को नमाज़ का आदेश दो, जब उनकी आयु सात साल हो जाए, और उन्हें उसके लिए मारो, जब उनकी आयु दस साल हो जाए तथा उनके बिसतर अलग कर दो।"इसे अबू दावूद ने रिवायत किया है
अब्दुल्लाह बिन ज़ैद बिन आसिम माज़िनी (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) वृष्टि माँगने के लिए नमाज़ पढ़ने को निकले, तो क़िबले की ओर मुँह करके दुआ की, अपनी चादर पलटी और फिर दो रकात नमाज़ पढ़ी, जिसमें ऊँची आवाज़ में तिलावत की। तथा एक रिवायत में है कि आप 'मुसल्ला' (नमाज़गाह) की ओर निकले।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस (रज़ियल्लाहु अंहु) नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से रिवायत करते हुए कहते हैंः "खाओ, पियो और दान करो। हाँ, मगर घमंड और फ़िज़ूलख़र्ची को राह न दो।"इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे बुख़ारी ने तालीक़न यक़ीन के सेग़े के साथ रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।
आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है, उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "मरे हुए लोगों को बुरा-भला न कहो, क्योंकि वे उसकी ओर जा चुके हैं, जो कर्म उन्होंने आगे भेजे हैं।"इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है
अब्दुर रहमान बिन अबू लैला कहते हैं कि काब बिन उजरा मुझसे मिले और कहने लगे : क्या मैं तुम्हें कोई तोहफ़ा न दूँ? अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हमारे पास आए, तो हमने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, हम यह तो जान गए हैं कि हम आप पर सलाम कैसे भेजें, लेकिन हम आप पर दरूद कैसे भेजें? तो आपने फ़रमाया : "कहो : «اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ، اللَّهُمَّ بَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا بَارَكْتَ عَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ» (ऐ अल्लाह! मुहम्मद और मुहम्मद के परिवार-परिजन पर रहमत नाज़िल फरमा, जैसे तूने इबराहीम के परिवार-परिजन पर रहमत नाज़िल की थी। बेशक तू प्रशंसा के योग्य और महिमावान है। ऐ अल्लाह! मुहम्मद और मुहम्मद के परिवार-परिजन पर बरकत नाज़िल फरमा, जैसे तूने इबराहीम के परिवार-परिजन पर बरकत नाज़िल की थी। बेशक तू प्रशंसा के योग्य और महिमावान है।)इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
उबादा बिन सामित रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जिसने सूरा-ए-फ़ातिहा नहीं पढ़ी, उसकी नमाज़ ही नहीं।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि मैंने किसी इमाम के पीछे नमाज़ नहीं पढ़ी, जो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से अधिक हल्की और संपूर्ण नमाज़ पढ़ाता हो।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "जो जनाज़े में नमाज़ संपन्न होने तक शामिल रहा, उसके लिए एक क़ीरात नेकी है और जो दफ़नाए जाने तक शरीक रहा, उसके लिए दो क़ीरात नेकी है।" कहा गया कि दो क़ीरात क्या हैं? तो फ़रमायाः "दो बड़े-बड़े पहाड़ो के बराबर।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
जुंदुब बिन अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने क़ुरबानी के दिन नमाज़ के पश्चात ख़ुतबा दिया, फिर क़ुरबानी की और फ़रमायाः "जिसने नमाज़ पढ़ने से पहले क़ुरबानी कर ली, वह उसके स्थान पर दूसरी क़ुरबानी करे और जिसने क़ुरबानी नहीं की, वह अल्लाह के नाम से क़ुरबानी करे।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
जुनदुब बिन अब्दुल्लाह क़सरी रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जिसने सुबह की नमाज़ पढ़ी, वह अल्लाह की रक्षा में होता है। अतः, (ऐसा कम करो कि) अल्लाह तुमको अपनी रक्षा में किसी भी चीज़ के आधार पर हरगिज़ तलब न करे। क्योंकि जिसे अल्लाह अपनी रक्षा में से किसी चीज़ के आधार पर तलब करेगा, उसे पा लेगा, फिर उसे औंधे मुँह जहन्नम की आग में डाल देगा।"इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जो सुबह के समय या शाम के समय मस्जिद की ओर जाता है, तो वह सुबह या शाम को जब भी जाता है, उसके बदले अल्लाह उसके लिए जन्नत में सत्कार का सामान तैयार करता है।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
उमर बिन ख़त्ताब (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का फ़रमान हैः “जो व्यक्ति अपनी रात की पूरी नमाज़ या उसका कुछ भाग पढ़े बिना सो जाए, फिर प्रातः उठकर फज्र तथा ज़ुहर के बीच पढ़ ले, उसे ऐसा लिखा जाएगा, जैसे उसने उसे रात ही में पढ़ी हो।”इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से वर्णित है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायः “वह मोमिन जो लोगों से मेल-जोल रखता है तथा उनकी ओर से मिलने वाली यातनाओं पर सब्र करता है, उस मोमिन से अच्छा है, जो लोगों से मेल-जोल नहीं रखता तथा उनकी यातनाओं पर सब्र नहीं करता।”इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “सदक़ा करने से किसी का माल कम नहीं होता है, बंदो को क्षमा करने से अल्लाह माफ़ करने वाले के आदर-सम्मान को और बढ़ा देता है और जो व्यक्ति अल्लाह के लिए विनम्रता धारण करता है, अल्लाह उसका स्थान ऊँचा कर देता है।”इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
अब्दुल्लाह बिन सलाम रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : जब अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मदीना आए, तो लोग आपकी ओर दौड़ पड़े और कहा जाने लगा कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम आ गए हैं। अल्लाह के रसूल आ गए हैं। अल्लाह के रसूल आ गए हैं। तीन बार। देखने के लिए मैं भी लोगों के साथ पहुँचा। जब ध्यान से आपका चेहरा देखा, तो पता लग गया कि यह किसी झूठे का चेहरा नहीं है। इस दौरान मैंने आपको जो पहली बात कहते हुए सुना वह यह थी : "हे लोगों, सलाम फैलाओ (प्रचारित करो), लोगों को खाना खिलाओ, रिश्तेदारियों को जोड़ो, रात्रि में जब लोग सो रहे होते हैं, तो उठ कर नमाज़ पढ़ो, (ऐसा करने पर) सुरक्षित रूप से जन्नत में प्रवेश पा जाओगे।"इसे तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया है
अनस (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि उन्होंने साबित (रह़िमहुल्लाह) से फ़रमायाः क्या मैं अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के शब्दों के द्वारा तुम्हरा इलाज न करूँ? उन्होंने कहाः अवश्य कीजिए। तब उन्होंने यह दुआ पढ़ीः “ऐ लोगों के रब (पालनहार), तकलीफों तथा रोगों को दूर करने वाले, रोग से मुक्ति प्रदान कर। तेरे सिवा कोई शिफा देने वाला नहीं है। रोग से ऐसा छुटकारा प्रदान कर कि फिर कोई रोग शेष न रहे।”इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।