Hadith for the World
इबादतों पर आधारित फ़िक़्ह

नमाज़

126 hadiths

126 hadiths

अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) का वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब रात को तहज्जुद पढ़ते, तो यह दुआ पढ़ते : «اللهم ربَّنا لك الحمدُ، أنت قَيِّمُ السموات والأرض، ولك الحمدُ أنت ربُّ السموات والأرض ومَن فيهنَّ، ولك الحمدُ أنت نورُ السموات والأرض ومن فيهنَّ، أنت الحقُّ، وقولُك الحقُّ، ووعدُك الحقُّ، ولقاؤك الحقُّ، والجنةُ حقٌّ، والنارُ حقٌّ، والساعةُ حقٌّ، اللهم لك أسلمتُ، وبك آمنتُ، وعليك توكَّلتُ، وإليك خاصمتُ، وبك حاكمتُ، فاغفر لي ما قدَّمتُ وما أخَّرتُ، وأسررتُ وأعلنتُ، وما أنت أعلم به مني، لا إلهَ إلا أنت». (ऐ अल्लाह! ऐ हमारे रब! सारी प्रशंसा तेरी है, तू आकाशों तथा धरती का रखवाला है। सारी प्रशंसा तेरी है, तू आकाशों तथा धरती और उनकी सारी वस्तुओं का रब है। सारी प्रशंसा तेरी है, तू ही आकाशों तथा धरती और उनकी सारी वस्तुओं का नूर है। तू सत्य है। तेरी बात सत्य है। तेरा वचन सत्य है। तुझसे मिलना सत्य है। जन्नत सत्य है। जहन्नम सत्य है। क़यामत सत्य है। ऐ अल्लाह! मैंने अपने आपको तेरे हवाले कर दिया, तुझपर ईमान लाया, तुझपर भरोसा किया, तेरी मदद से अपने शत्रुओं से झगड़ा किया और निर्णय को तेरे हवाले कर दिया। अतः, मेरे उन सारे गुनाहों को क्षमा कर दे, जो मैंने पहले किए और जो मैं करने वाला हूँ और जो मैंने छिपाकर किए और जो दिखाकर किए और जिन्हें तू मुझसे अधिक जानता है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है।)इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
समुरा बिन जुनदुब (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: जिसने जुमे के दिन वज़ू किया, उसने सुन्नत पर अमल किया और बहुत अच्छा किया तथा जिसने स्नान किया, उसका यह कार्य उससे बेहतर है।इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है। - इसे दारिमी ने रिवायत किया है।
अम्र बिन सुलैम अंसारी कहते हैं : मैं गवाही देता हूँ कि अबू सईद ने कहा है और उन्होंने गवाही दी है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जुमे के दिन हर व्यस्क व्यक्ति पर स्नान करना अनिवार्य है तथा यह कि वह दातुन करे और मिल सके तो ख़ुशबू भी लगाए।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: जब नमाज़ के लिए अज़ान कही जाती है, तो शैतान हवा निकालता हुआ पीठ फेरकर भाग खड़ा होता है; ताकि अज़ान की आवाज़ न सुन सके। जब अज़ान पूरी हो जाती है, तो वापस आ जाता है। फिर जब नमाज़ के लिए इक़ामत कही जाती है, तो पीठ फेरकर भाग जाता है। जब इक़ामत ख़त्म हो जाती है, तो फिर सामने आ जाता है, ताकि नमाज़ी के ध्यान को भंग कर सके। वह कहता है: यह बात याद कर, वह बात याद कर। (यानी वह बातें जो पहले नमाज़ी को याद नहीं थीं) यहाँ तक कि आदमी को यह याद नहीं रहता कि उसने कितनी रकात नमाज़ पढ़ी है।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
मुआविया -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को यह फरमाते हुए सुना है : "क़यामत के दिन अज़ान देने वालों की गर्दनें सबसे ऊँची होंगी।"इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: जुमे के दिन फ़रिश्ते मस्जिद के द्वार पर खड़े हो जाते हैं और सिलसिलेवार मस्जिद में आने वालों के नाम लिखते जाते हैं। सबसे पहले मस्जिद में प्रवेश करने वाले की मिसाल उस व्यक्ति की तरह है, जिसने ऊँट की क़ुर्बानी दी हो, फिर उसकी तरह जिसने गाय की क़ुर्बानी दी हो, फिर मेंढे की, फिर मुर्गी की और फिर अंडे की। जब इमाम प्रवचन के लिए निकल आता है, तो वे अपने रजिस्टर समेट लेते हैं और प्रवचन सुनने लगते हैं।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु् अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: जब आदम की संतान सजदे वाली आयत पढ़ती है और सजदा करती है, तो शैतान रोता हुआ दूर हट जाता है। वह कहता है: हाय मेरी बरबादी! आदम की संतान को सजदे का आदेश दिया गया और उसने सजदा किया, तो उसके लिए जन्नत है, जबकि मुझे सजदे का आदेश दिया गया, तो मैंने इनकार कर दिया, अतः मेरे लिए जहन्नम है।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: जिसने सूरज निकलने से पहले सुबह की एक रकात पाई, उसने सुबह की नमाज़ पा ली और जिसने सूरब डूबने से पहले अस्र की एक रकात पाई, उसने अस्र की नमाज़ पा ली।इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
उक़बा बिन आमिर जुहनी -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है, वह कहते हैं : तीन समय ऐसे हैं, जिनमें अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हमें नमाज़ पढ़ने अथवा अपने मुर्दों को दफ़नाने से मना करते थे : जब सूरज स्पष्ट रूप से निकल रहा हो, यहाँ तक कि ऊँचा हो जाए, जब सूरज बीच आसमान में हो, यहाँ तक कि ढल जाए और जब सूरज डूबने लगे, यहाँ तक कि डूब जाए।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
जुबैर बिन मुतइम (रज़ियल्लाहु अनहु) से मरफ़ूअन वर्णित है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: किसी को रात या दिन के जिस भाग में चाहे, इस घर का तवाफ़ (परिक्रमा) करने या इसमें नमाज़ पढ़ने से न रोको।इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है। - इसे दारिमी ने रिवायत किया है।
जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : ''जिसने अज़ान सुनते समय यह दुआ पढ़ी : "ऐ अल्लाह! इस संपूर्ण आह्वान तथा खड़ी होने वाली नमाज़ के रब! मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को वसीला (जन्नत का सबसे ऊँचा स्थान) और श्रेष्ठतम दर्जा प्रदान कर और उन्हें वह प्रशंसनीय स्थान प्रदान कर, जिसका तूने उन्हें वचन दिया है।" उसके लिए क़यामत के दिन मेरी सिफ़ारिश अनिवार्य हो जाएगी।''इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है
अबू मरसद ग़नवी रज़ियल्लाहु अनहु बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “क़ब्रों पर मत बैठो और उनकी ओर मुँह करके नमाज़ न पढ़ो।”इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
अब्दुल्लाह बिन शिख़्ख़ीर (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को नमाज़ पढ़ते समय देखा कि आपके सीने से रोने के कारण चक्की के चलने की तरह आवाज़ निकल रही है। आपपर अल्लाह की कृपा हो और शांति की धारा बरसे।इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।
अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "जब खाना सामने रख दिया जाए, तो मग़रिब की नमाज़ से पहले खाना खा लो और खाना छोड़कर नमाज़ के लिए जाने की जल्दी न करो।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने एक बार (मस्जिद के अंदर) क़िबले की ओर थूक देखा, तो यह आपको बहुत बुरा लगा और इसका प्रभाव आपके चेहरे पर देखा गया। चुनांचे आप खड़े हुए और उसे अपने हाथ से साफ़ किया तथा फ़रमाया : "तुममें से कोई जब नमाज़ में खड़ा होता है, तो वह अपने रब से व्यक्तिगत रूप से बात कर रहा होता है या उसका रब उसके और क़िबले के बीच होता है। इसलिए, तुममें से कोई (नमाज़ की हालत में) क़िबले की ओर न थूके। बल्कि बाएँ तरफ़ या अपने क़दमों के नीचे थूके।" फिर आपने अपनी चादर के एक किनारे को पकड़कर उसमें थूका और उसे आपस में रगड़ दिया और कहा : "या फिर इस तरह करे।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "कुछ लोगों को क्या हो गया है कि वे नमाज़ में अपनी नज़रें आकाश की ओर उठाते हैं?" आपने इसके बारे में बड़ी सख़्त बात करते हुए यहाँ तक फ़रमा दिया : "वे इससे ज़रूर रुक जाएँ, वरना उनकी आँखें उचक ली जाएँगी।"इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है
मुसलमानों की माता आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है कि उम्म-ए-सलमा रज़ियल्लाहु अनहा ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास हबशा (इथियोपिया) में देखे हुए मारिया नामी एक गिरजाघर और उसके चित्रों का वर्णन किया, तो आपने कहा : "वे ऐसे लोग हैं कि उन लोगों के अंदर जब कोई सदाचारी बंदा अथवा सदाचारी व्यक्ति मर जाता, तो उसकी कब्र के ऊपर मस्जिद बना लेते और उसमें वो चित्र बना देते। वे अल्लाह के निकट सबसे बुरे लोग हैं।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
इब्ने अब्बास -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल - सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने पर्दा हटाया तो देखा कि लोग अबू बकर के पीछे पंक्ति में खड़े हैं, तो आप ने फरमायाः( ऐ लोगों, नबूवत के शुभ संदेशों में से अब केवल अच्छे स्वप्न ही रह गए हैं, जिस को मुस्लिम देखता है, या उस के लिए देखा जाता है, सचेत रहो! मुझे रुकू तथा सज्दा में क़ुरआन पढ़ने से मना किया गया है। जहां तक रूकू की बात है तो उस में अपने रब की महानता का बखान करो, रही बात सज्दे की तो उस मके साथ दुआ करो, क्योंकि उस समय की गई दुआ के स्वीकार होने की प्रबल संभावना रहती है।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
ह़कम से वर्णित है, वह कहते हैं कि कूफा पर इब्ने अशअस़ के समय में एक व्यक्ति का प्रभुत्व हो गया था -जिस का नाम उन्होंने बताया था-, तो इब्ने अशअस़ ने अबू उबैदा बिन अब्दुल्लाह को लोगों को नमाज़ पढ़ाने का आदेश दिया, अतः वह लोगों को नमाज़ पढ़ाया करते थे, जब वह रुकू से सिर उठाते तो उतने समय तक खड़े रहते जितने समय में मैं (اللَّهُم ربَّنا لك الحَمد، مِلْءَ السَّماوات ومِلْءَ الأرض، ومِلْءَ ما شِئت من شَيء بعد، أهْل الثَّناء والمَجد، لا مانع لما أعْطَيت، ولا مُعْطِي لما مَنعت، ولا يَنفع ذَا الجَدِّ مِنْك الجَدِّ) ऐ अल्लाह, तेरे लिए आकाश भर और पृथ्वी भर तथा उस के सिवा भी जो तू चाहे उतनी, समस्त प्रकार की प्रशंसा है, तू प्रशंसा तथा महानता के योग्य है, जिस को तू दे दे उसे कोई रोकने वाला नहीं, और जिस से तू रोक दे उसे कोई देने वाला नहीं, तेरे यहां किसी का वैभव कुछ भी काम नहीं आएगा। ह़कम कहते हैंः मैंने इसका उल्लेख अब्दुर्रहमान बिन अबू लैला से किया, तो उन्होंने कहा किः मैंने बरा बिन आज़िब- रज़ियल्लाहु अन्हु- को फरमाते हुए सुना हैः नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की नमाज़, और आप का रुकू, तथा जब आप रुकू से सिर उठाते (उस के बाद का समय), और आप के सज्दे तथा दो सज्दों के मध्य बैठने का समय, सभी लग-भग बराबर होते। शोअबा कहते हैं कि मैंने इस का उल्लेख अम्र बिन मु्र्रा से किया तो उन्होंने फरमायाः मैंने इब्ने अबू लैला को देखा है, उन की नमाज़ इस प्रकार की नहीं थी।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "मुझे ‏शरीर के सात अंगों पर सजदा करने का हुक्म दिया गया है: पेशानी पर और आपने अपने हाथ से अपनी नाक की ओर इशारा किया, दोनों हाथों और दोनों घुटनों तथा दोनों पावों की उंग्लियों पर और यह भी हुक्म दिया गया कि हम कपड़ों और बालों को न समेटें।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अनहुमा से रिवायत है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम दो सजदों के बीच में यह दुआ पढ़ते थे : "ऐ अल्लाह! तू मुझे माफ कर दे, मेरे ऊपर रहम कर, मुझे आफियत (स्वास्थ्य इत्यादि) दे तथा मुझे रोज़ी प्रदान कर।"इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया है
अनस बिन मालिक- रज़ियल्लाहु अन्हु- से ही रिवायत है कि नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- क़ुनूत उसी समय पढ़ा करते थे जब आप किसी के लिए दुआ करते या किसी पर बद्दुआ करते।इसे इब्ने ख़ुज़ैमा ने रिवायत किया है ।
सौबान रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब नमाज़ समाप्त करते, तो तीन बार अल्लाह से क्षमा माँगते और यह दुआ पढ़ते : "ऐ अल्लाह! तू ही शांति वाला है और तेरी ओर से ही शांति है। तू बरकत वाला है ऐ महानता और सम्मान वाले!" वलीद कहते हैं : मैंने औज़ाई से कहा : क्षमा कैसे माँगी जाए? उन्होंने उत्तर दिया : तुम बस इतना कहो : मैं अल्लाह से क्षमा माँगता हूँ, मैं अल्लाह से क्षमा माँगता हूँ।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जिसने प्रत्येक नमाज़ के पश्चात तैंतीस बार सुब्हान अल्लाह, तैंतीस बार अल-हम्दु लिल्लाह और तैंतीस बार अल्लाहु अकबर कहा, जो कि कुल निन्यानवे बार हुए, और सौ पूरा करने के लिए ''لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير'' (अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं, उसी के लिए बादशाहत है, उसी के लिए सब प्रशंसाएँ हैं, और उसको हर चीज़ पर सामर्थ्य प्राप्त है) कहा, उसके समस्त पाप माफ़ कर दिए जाते हैं, यद्यपि वे समुद्र के झाग के बराबर ही क्यों न हों।"इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है