Hadith for the World
नमाज़

नमाज़ के अज़कार

15 hadiths

15 hadiths

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इन शब्दों द्वारा दुआ करते थे : "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ क़ब्र की यातना से, जहन्नम की यातना से, जीवन और मृत्यु के फ़ितने से और मसीह-ए-दज्जाल के फ़ितने से।" और मुस्लिम की एक रिवायत में है : "जब तुममें से कोई तशह्हुद पढ़ चुके, तो चार चीज़ों से अल्लाह की शरण माँगे : जहन्नम की यातना से, क़ब्र की यातना से, जीवन और मृत्यु के फ़ितने से और मसीह-ए-दज्जाल के फ़ितने से।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब नमाज़ की तकबीर कहते, तो (सूरा फ़ातिहा) पढ़ने से पहले कुछ देर ख़ामोश रहते। सो, मैंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, आपपर मेरे माँ-बाप फ़िदा हों, आप तकबीर और (सूरा फ़ातिहा) पढ़ने के बीच जो खामोश रहते हैं, उसमें क्या पढ़ते हैं? फ़रमाया : मैं कहता हूँ : ऐ अल्लाह, मेरे तथा मेरे गुनाहों के बीच उतनी दूरी पैदा कर दे, जितनी दूरी पूरब और पश्चिम के बीच रखी है। ऐ अल्लाह, मुझे गुनाहों से साफ़ कर दे, जैसे उजले कपड़े को मैल-कुचैल से साफ़ किया जाता है। ऐ अल्लाह, मुझे मेरे गुनाहों से पानी, बर्फ और ओले से धो दे।"इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
मुआज़ बिन जबल रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनका हाथ पकड़ा और फ़रमाया : "ऐ मुआज़! अल्लाह की क़सम, मैं तुमसे मोहब्बत रखता हूँ।" आगे फ़रमाया : "ऐ मुआज़! मैं तुमको वसीयत करता हूँ कि हर नमाज़ के बाद यह दुआ पढ़ना हरगिज़ न छोड़ना : ऐ अल्लाह! अपने ज़िक्र करने, शुक्र करने और बेहतर अंदाज़ में अपनी इबादत करने में मेरी मदद फ़रमा।"इस ह़दीस़ को अबू दावूद, नसई और अह़मद ने रिवायत किया है
अब्दुर रहमान बिन अबू लैला कहते हैं कि काब बिन उजरा मुझसे मिले और कहने लगे : क्या मैं तुम्हें कोई तोहफ़ा न दूँ? अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हमारे पास आए, तो हमने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, हम यह तो जान गए हैं कि हम आप पर सलाम कैसे भेजें, लेकिन हम आप पर दरूद कैसे भेजें? तो आपने फ़रमाया : "कहो : «اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ، اللَّهُمَّ بَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا بَارَكْتَ عَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ» (ऐ अल्लाह! मुहम्मद और मुहम्मद के परिवार-परिजन पर रहमत नाज़िल फरमा, जैसे तूने इबराहीम के परिवार-परिजन पर रहमत नाज़िल की थी। बेशक तू प्रशंसा के योग्य और महिमावान है। ऐ अल्लाह! मुहम्मद और मुहम्मद के परिवार-परिजन पर बरकत नाज़िल फरमा, जैसे तूने इबराहीम के परिवार-परिजन पर बरकत नाज़िल की थी। बेशक तू प्रशंसा के योग्य और महिमावान है।)इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) कहती हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपने रुकू और सजदे में कहा करते थेः ऐ अल्लाह! तू पवित्र एवं पाक है तथा फ़रिश्तों एवं जिबरील का रब है।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
काब बिन उजरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "प्रत्येक फ़र्ज नमाज़ के पश्चात कही जाने वाली तसबीहों को कहने वाले -या उनका पालन करने वाले- नाकाम नहीं होंगे। अर्थात 33 बार सुबहानल्लाह, 33 बार अल-हम्दु लिल्लाह और 34 बार अल्लाहु अकबर।"इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
अली बिन अबू तालिब (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब नमाज़ के लिए खड़े होते, तो यह दुआ पढ़तेः «وجَّهت وجْهي للذي فَطَر السَّماوات والأرض حَنيفا، وما أنا من المشركين، إن صلاتي، ونُسُكي، ومَحْيَاي، ومَمَاتِي لله ربِّ العالمين، لا شريك له، وبذلك أُمِرت وأنا من المسلمين، اللهُمَّ أنت الملك لا إله إلا أنت أنت ربِّي، وأنا عَبدُك، ظَلمت نفسي، واعترفت بِذنبي، فاغفر لي ذُنوبي جميعا، إنه لا يَغفر الذُّنوب إلا أنت، واهدِنِي لأحْسَن الأخلاق لا يَهدي لأحْسَنِها إلا أنت، واصرف عَنِّي سيِّئها لا يصرف عني سيِّئها إلا أنت، لبَّيك وسَعديك والخير كلُّه في يَديك، والشَرُّ ليس إليك، أنا بِك وإليك، تَبَاركت وتَعاليت، أستغفرك وأتوب إليك» (मैंने एकाग्र होकर अपना मुख उसकी ओर कर लिया है, जिसने आकाशों और धरती की रचना की है, और मैं साझी ठहराने वालों में से नहीं हूँ। मेरी नमाज़, मेरी क़ुरबानी, मेरा जीना और मेरा मरना, सब अल्लाह के लिए है, जो समस्त संसार का रब है। उसका कोई साझी नहीं। मुझे इसी का आदेश दिया गया है और मैं मुसलमानों में से हूँ। ऐ अल्लाह! तू ही बादशाह है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं। तू मेरा रब है और मैं तेरा बंदा। मैंने अपने ऊपर ज़ुल्म किया है और अपने पापों का इक़रार करता हूँ। अतः, मेरे समस्त पापों को क्षमा कर दे, क्योंकि पापों को क्षमा करने वाला तेरे सिवा कोई नहीं। तू मुझे अच्छे आचरण का मार्ग दिखा, क्योंकि अच्छे आचरण का मार्ग केवल तू ही दिखाता है। और बुरे आचरण से मुझे दूर रख, क्योंकि बुरे आचरण से मुझे दूर केवल तू ही रख सकता है। मैं तेरे आगे उपस्थित हूँ, तेरा आज्ञाकारी हूँ तथा समस्त प्रकार की भलाई तेरे ही हाथों में है, और बुराई की निसबत तेरी ओर नहीं की जा सकती। मेरी तौफीक़ तेरी तरफ़ से है और मेरी इल्तिजा भी तुझसे है। तू बरकत वाला तथा बुलंद है। मैं तुझ ही से क्षमा माँगता हूँ तथा तेरे ही सामने तौबा करता हूँ।) और जब रूकू करते, तो कहतेः «اللهُمَّ لك رَكَعت، وبِك آمَنت، ولك أسْلَمت، خَشع لك سَمعي، وبَصري، ومُخِّي، وعَظمي، وعَصَبي» (ऐ अल्लाह! मैंने तेरे ही लिए रुकू किया, मैं तुझपर ईमान लाया और तेरा आज्ञाकारी बना। तेरे लिए मेरे कान, मेरी आँख, मेरे दिमाग, मेरी हड्डी तथा मेरे पुठ्ठे ने विनम्रता दिखाई।) और जब रुकू से सर उठाते, तो कहतेः «اللهُمَّ ربَّنا لك الحَمد مِلْءَ السماوات، و مِلْءَ الأرض، ومِلْءَ ما بينهما، ومِلْءَ ما شئت من شيء بعد» (ऐ अल्लाह! तेरे लिए आकाश भर, धरती भर, और जो कुछ इन दोनों के बीच है, उतनी और उसके पश्चात जितनी तू चाहे, उतनी प्रशंसा है।) और जब सजदा करते, तो कहतेः «اللهُمَّ لك سَجدت، وبك آمَنت، ولك أسْلَمت، سجد وجْهِي للذي خَلَقه، وصَوَّره، وشَقَّ سَمعه وبَصره، تبارك الله أحْسَن الخَالقِين» (ऐ अल्लाह! मैंने तेरे लिए सजदा किया, मैं तुझपर ईमान लाया और तेरा आज्ञाकारी हुआ। मेरे चेहरे ने उसके लिए सजदा किया, जिसने उसकी रचना की है और उसका चित्रण किया है, तथा कान और आँख को चीरा है। अल्लाह तआला बड़ी बरकत वाला है और सभी बनाने वालों से अच्छा बनाने वाला है।) फिर सबसे अंत में तशह्हुद और सलाम फेरने के बीच यह दुआ पढ़तेः «اللهُم اغْفِر لي ما قَدَّمت وما أخَّرت، وما أسْرَرْت وما أعْلَنت، وما أَسْرَفْتُ، وما أنت أعْلَم به مِنِّي، أنت المُقَدِّم وأنت الْمُؤَخِّر، لا إله إلا أنت» (ऐ अल्लाह! मैंने जो पहले किया और जो बाद में किया, जो छिपाकर किया तथा जो दिखाकर किया और जिसमें मैंने अति की और जिसको तू मुझसे भी बेहतर जानने वाला है, उन सभी गुनाहों को माफ़ कर दे। तू ही आदेशपालन का सामर्थ्य देकर आगे करता है और तू ही अवज्ञा के कारण पीछे करता है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है।)इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
ह़कम से वर्णित है, वह कहते हैं कि कूफा पर इब्ने अशअस़ के समय में एक व्यक्ति का प्रभुत्व हो गया था -जिस का नाम उन्होंने बताया था-, तो इब्ने अशअस़ ने अबू उबैदा बिन अब्दुल्लाह को लोगों को नमाज़ पढ़ाने का आदेश दिया, अतः वह लोगों को नमाज़ पढ़ाया करते थे, जब वह रुकू से सिर उठाते तो उतने समय तक खड़े रहते जितने समय में मैं (اللَّهُم ربَّنا لك الحَمد، مِلْءَ السَّماوات ومِلْءَ الأرض، ومِلْءَ ما شِئت من شَيء بعد، أهْل الثَّناء والمَجد، لا مانع لما أعْطَيت، ولا مُعْطِي لما مَنعت، ولا يَنفع ذَا الجَدِّ مِنْك الجَدِّ) ऐ अल्लाह, तेरे लिए आकाश भर और पृथ्वी भर तथा उस के सिवा भी जो तू चाहे उतनी, समस्त प्रकार की प्रशंसा है, तू प्रशंसा तथा महानता के योग्य है, जिस को तू दे दे उसे कोई रोकने वाला नहीं, और जिस से तू रोक दे उसे कोई देने वाला नहीं, तेरे यहां किसी का वैभव कुछ भी काम नहीं आएगा। ह़कम कहते हैंः मैंने इसका उल्लेख अब्दुर्रहमान बिन अबू लैला से किया, तो उन्होंने कहा किः मैंने बरा बिन आज़िब- रज़ियल्लाहु अन्हु- को फरमाते हुए सुना हैः नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की नमाज़, और आप का रुकू, तथा जब आप रुकू से सिर उठाते (उस के बाद का समय), और आप के सज्दे तथा दो सज्दों के मध्य बैठने का समय, सभी लग-भग बराबर होते। शोअबा कहते हैं कि मैंने इस का उल्लेख अम्र बिन मु्र्रा से किया तो उन्होंने फरमायाः मैंने इब्ने अबू लैला को देखा है, उन की नमाज़ इस प्रकार की नहीं थी।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अनहुमा से रिवायत है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम दो सजदों के बीच में यह दुआ पढ़ते थे : "ऐ अल्लाह! तू मुझे माफ कर दे, मेरे ऊपर रहम कर, मुझे आफियत (स्वास्थ्य इत्यादि) दे तथा मुझे रोज़ी प्रदान कर।"इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया है
सौबान रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब नमाज़ समाप्त करते, तो तीन बार अल्लाह से क्षमा माँगते और यह दुआ पढ़ते : "ऐ अल्लाह! तू ही शांति वाला है और तेरी ओर से ही शांति है। तू बरकत वाला है ऐ महानता और सम्मान वाले!" वलीद कहते हैं : मैंने औज़ाई से कहा : क्षमा कैसे माँगी जाए? उन्होंने उत्तर दिया : तुम बस इतना कहो : मैं अल्लाह से क्षमा माँगता हूँ, मैं अल्लाह से क्षमा माँगता हूँ।इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जिसने प्रत्येक नमाज़ के पश्चात तैंतीस बार सुब्हान अल्लाह, तैंतीस बार अल-हम्दु लिल्लाह और तैंतीस बार अल्लाहु अकबर कहा, जो कि कुल निन्यानवे बार हुए, और सौ पूरा करने के लिए ''لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير'' (अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं, उसी के लिए बादशाहत है, उसी के लिए सब प्रशंसाएँ हैं, और उसको हर चीज़ पर सामर्थ्य प्राप्त है) कहा, उसके समस्त पाप माफ़ कर दिए जाते हैं, यद्यपि वे समुद्र के झाग के बराबर ही क्यों न हों।"इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
अबू उमामा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जिसने प्रत्येक फर्ज़ नमाज़ के पश्चात आयतुल कुर्सी पढ़ी, उसको जन्नत में जाने से मौत के सिवा कोई चीज़ रोक नहीं सकती।"इसे नसई ने अल-कुबरा में रिवायत किया है
अब्दुल्लाह बिन अबू औफ़ा रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब रुकू से पीठ उठाते, तो यह दुआ पढ़ते : "سَمِعَ اللهُ لِمَنْ حَمِدَهُ، اللَّهُمَّ رَبَّنَا لَكَ الْحَمْدُ، مِلْءَ السَّمَاوَاتِ وَمِلْءَ الْأَرْضِ وَمِلْءَ مَا شِئْتَ مِنْ شَيْءٍ بَعْدُ" (अल्लाह ने उसकी सुन ली, जिसने उसकी प्रशंसा की। ऐ अल्लाह! हमारे रब! तेरी ही प्रशंसा है आकाशों भर, ज़मीन भर और उनके बाद भी तू जो चाहे, उसके भर।)इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
عن ابن عمر قال: بينما نحن نصلي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم إذ قال رجل من القوم: الله أكبر كبيرًا، والحمد لله كثيرًا، وسبحان الله بكرةً وأصيلًا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: «من القائلُ كلمة كذا وكذا؟» قال رجل من القوم: أنا، يا رسول الله. قال: «عجبتُ لها، فتحت لها أبواب السماء» قال ابن عمر: «فما تركتهن منذ سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول ذلك».رواه مسلم
عن أبي بكر الصديق رضي الله عنه: أنه قال لرسول الله صلى الله عليه وسلم: علمني دعاء أدعو به في صلاتي، قال: "قل: اللهم إني ظلمت نفسي ظلما كثيرا، ولا يغفر الذنوب إلا أنت، فاغفر لي مغفرة من عندك، وارحمني إنك أنت الغفور الرحيم".متفق عليه